- जंगल के अंदर से 33 केवी लाईन डाली, बिना भू-प्रत्यावर्तन के निर्माण, नदी का स्वरूप बदला
रायगढ़। धनवादा पावर कंपनी हैदराबाद ने सारे नियमों को बायपास कर अपना प्लांट मांड नदी पर लगा लिया। वन विभाग, सीएसपीडीसीएल और जल संसाधन विभाग में ऐसी लॉबिंग हुई कि अब ये तीनों विभाग एकजुट होकर गड़बड़ी पर पर्दा डालने लगे हैं। अब यह मामला सियासी रंग पकडऩे लगा है। कई नेताओं ने खुलकर कंपनी की मनमानी को सरकार के सामने रखने का ऐलान किया है। धनवादा पावर एंड इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनी ने धरमजयगढ़ के भालूपखना में मांड नदी पर धनवादा पावर की 7.50 मेगावाट लघु जल विद्युत परियोजना लगाई है।
बिजली को पावरग्रिड तक लाने के लिए ट्रांसमिशन लाइन बिछाई गई है, जो सवालों के घेरे में है। रायगढ़ जिले में बीते दो सालों में दर्जन भर हाथियों की मौत हो चुकी है। धरमजयगढ़ वनमंडल में हाथियों का स्थाई ठिकाना है। प्रोटेक्टेड फॉरेस्ट एरिया में हाथी स्वच्छंद विचरण करते हैं। धनवादा पावर को जब अनुमति दी गई तो इन सब तथ्यों को नजरअंदाज किया गया। किसी भी तरह से कंपनी को जल्द से जल्द प्लांट लगाने की एनओसी दी गई। यहां के आसपास गांवों में बिजली सप्लाई के लिए 11 केवी लाइन बिछाई गई है। धनवादा कंपनी को अपनी 33 केवी लाइन को ले जाने के लिए प्रोटेक्टेड फॉरेस्ट कम्पार्टमेंट पी-99 और पी-101 की जमीन उपयोग करनी पड़ी।
कंपनी इसके लिए विधिवत अनुमति की प्रक्रिया से नहीं गुजरना चाहती थी। इसलिए पहले सीएसपीडीसीएल के माध्यम से डीएफओ के समक्ष आवेदन करवाया गया। पुरानी लाइन में सुधार के नाम पर धनवादा की 33 केवी लाइन बिछा दी। सीएसपीडीसीएल ने अपने ही नोटिफिकेशन को छिपाकर निजी कंपनी के हित में काम किया। वन क्षेत्र में बिना वन भूमि प्रत्यावर्तन के ही सीएसपीडीसीएल के खंभों का इस्तेमाल करके 33 केवी के केबल बिछा दिए। हाथी प्रभावित क्षेत्र में केबल बिछाने के लिए गाइडलाइन का पालन नहीं किया गया।
वन भूमि पर गैर वानिकी कार्य
धनवादा पावर की महज 7.5 मेगावाट पावर प्रोजेक्ट के लिए भालूपखना के खनं 347, 365, रैरूमाखुर्द के खनं 29/2, 87/2, 94/2 और चरखापारा के 792/1 में राजस्व वन क्षेत्र में 33 केवी ट्रांसमिशन लाइन बिछाने के लिए तत्कालीन कलेक्टर से एनओसी ली। इन तीनों गांवों में कुल 2.510 हे. पर कलेक्टर ने एनओसी दे दी। शर्त रखी गई कि वन भूमि पर गैर वानिकी प्रयोजन के लिए भूमि प्रत्यावर्तन कराना आवश्यक होगा। यदि वन विभाग भू-प्रत्यावर्तन की कार्यवाही करता है तथा आवेदक कंपनी ग्राम के धार्मिक व सामाजिक विन्यास को प्रभावित नहीं करता तो कलेक्टर कार्यालय को कोई आपत्ति नहीं होगी। मांड नदी में काम करने के बाद मूल स्वरूप में वापस लाने की शर्त पर एनओसी दी गई है, लेकिन वन विभाग ने भू-प्रत्यावर्तन की कार्यवाही ही नहीं की। पीसीसीएफ की गंभीर आपत्तियों के बावजूद प्लांट लग रहा है।
जल संसाधन विभाग के सामने मांड नदी का नक्शा बदला
डीएफओ द्वारा कलेक्टर को लिखा गया पत्र केवल औपचारिकता भर है। हैरानी की बात है कि डीएफओ ने अपने उच्च कार्यालय को प्रतिलिपि भी नहीं भेजी। मांड नदी जैसे महत्वपूर्ण जल स्रोत को लेकर जल संसाधन विभाग की भूमिका भी संदेहास्पद है। मांड नदी के बीच में कंस्ट्रक्शन किया गया लेकिन विभाग ने शर्त के मुताबिक निगरानी नहीं रखी। मांड नदी के मूल स्वरूप को ही बदल दिया गया है। यह कंपनी तेलंगाना की है जिसके फाउंडर मुरली कृष्णा धनवादा, राजेंद्र प्रसाद पाकला और श्रीनिवासुलु एंटीबेड्डी हैं। 2023 में कलेक्टर की एनओसी के बाद 2024 में रेंजर और एसडीएम ने कंपनी को नोटिस दिया। जबकि काम रोका जाना था। एसडीएम धरमजयगढ़ ने कंपनी के हरि असैया और सुनील चौधरी को नोटिस दिया था।
क्या कहते हैं उमेश
धनवादा पावर कंपनी को वन भूमि पर मिली एनओसी का मामला बेहद गंभीर है। इस मामले को सरकार के सामने रखेंगे।

क्या कहती हैं विद्यावती
जंगलों को उजाडऩे का काम सरकार कर रही है। इसीलिए ऐसी कंपनियों को मनमानी करने दी जा रही है। मामला संज्ञान में है।

क्या कहती हैं उत्तरी
धरमजयगढ़ के संरक्षित वन क्षेत्र में नियम विरुद्ध धनवादा कंपनी ने टावर लगाए हैं। सरकारी विभागों ने मिलीभगत करके कंपनी को छूट दी है।

क्या कहती हैं कविता
सरकार प्राइवेट पावर कंपनियों के लिए सारे नियम तोड़ रही है। धनवादा कंपनी को पर्यावरण के विरुद्ध मंजूरी दी गई है। कार्रवाई होनी चाहिए।

क्या कहते हैं चक्रधर
रायगढ़ में वन क्षेत्रों की वजह से पर्यावरण बचा हुआ है। उसे भी प्राइवेट कंपनियों को सौंपा जा रहा है, जो बहुत घातक है।

क्या कहते हैं हृदयराम
रायगढ़ जिले में धनवादा कंपनी को मांड नदी और जंगल को उजाडऩे के लिए अनुमति दी गई है। पर्यावरण नियमों की अनदेखी की गई है। इस पर कार्रवाई की मांग करेंगे।























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