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एल्डरमैन की कुर्सी ने बढ़ाया सियासी बवाल, ठगे गए दावेदार! बगावत के सुर तेज

File 1

रायगढ़। नगर पंचायत पुसौर की राजनीतिक फिजाओं में इन दिनों खासी गर्माहट है। वजह है – एल्डरमैन की नई नियुक्तियां। दरअसल, नगर पंचायत में एल्डरमैन का पद पार्षदों के ही बराबर रसूख और अधिकार वाला माना जाता है। यही कारण है कि जब भी इन पदों पर ताजपोशी की बारी आती है, तो पार्टी के प्रति वफादारी और जातीय समीकरणों को लेकर राजनीतिक गलियारों में अटकलों का बाजार पूरी तरह से गर्म हो जाता है। इस बार प्रदेश में काबिज भाजपा सरकार द्वारा की गई नई नियुक्तियों ने भी पुसौर में एक नया सियासी तूफान खड़ा कर दिया है। पुसौर नगर पंचायत के इतिहास पर नजर डालें तो अब तक कुल चार बार एल्डरमैन नियुक्त किए जा चुके हैं।

हर बार सत्ताधारी दल ने अपने-अपने हिसाब से राजनीतिक और जातीय संतुलन साधने की कोशिश की है। साल 2010 में जब भाजपा शासनकाल में पहली बार नियुक्तियां हुईं, तो भागवत साव और त्रिनाथ गुप्ता को यह जिम्मेदारी सौंपी गई थी। उस वक्त यह फैसला तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों के अनुकूल था और इसे लेकर कोई खास विवाद नहीं हुआ। इसके बाद 2015 में भी भाजपा ने अभिमन्यु साहू, घनश्याम पटेल और विजय महाणा को जमीनी स्तर पर पार्टी को मजबूत करने के इरादे से एल्डरमैन बनाया। वहीं, जब सत्ता में कांग्रेस आई, तो उन्होंने भी जातीय समीकरण बिठाते हुए बल्लभ गुप्ता, नीलकंठ यादव और धजाराम सौरा पर भरोसा जताया, जिसकी उस वक्त काफी चर्चा भी रही।लेकिन, असली घमासान मौजूदा वक्त की नियुक्तियों को लेकर मचा है।

लंबे इंतजार के बाद सरकार ने एक बार फिर तीन एल्डरमैन नियुक्त किए हैं, जिनमें त्रिनाथ गुप्ता, अभिमन्यु साहू और विकास होता का नाम शामिल है। यह नई सूची सामने आते ही क्षेत्र में विरोध के सुर तेज हो गए हैं। सूत्रों की मानें तो इस पूरे विवाद की जड़ बीते नगर पंचायत चुनाव में छिपी है। बताया जा रहा है कि टिकट वितरण के दौरान एक मजबूत दावेदार का टिकट सिर्फ इस वादे के साथ काट दिया गया था कि उन्हें बाद में एल्डरमैन बनाकर सम्मान दिया जाएगा। उस वक्त पार्टी के उस वादे पर भरोसा करते हुए उस अभ्यर्थी ने अपनी जगह दूसरे उम्मीदवार को मौका दे दिया। लेकिन, अब जब एल्डरमैन की फाइनल सूची जारी हुई, तो उस वादे को पूरी तरह से दरकिनार कर दिया गया।

सूची से उस नेता का नाम सिरे से गायब है। स्थानीय लोगों और समर्थकों का साफ कहना है कि अगर इलाके के जातीय समीकरणों को भी पैमाना बनाया जाता, तो उनका नाम सूची में सबसे ऊपर होना चाहिए था। चुनाव के वक्त किए गए इस कथित ‘धोखे’ और वादे से मुकरने को लेकर अब पार्टी के जमीनी कार्यकर्ताओं और आम जनता के बीच गहरी नाराजगी पनप रही है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि अपनों की ही इस नाराजगी से उठा यह सियासी बवंडर आने वाले दिनों में क्या गुल खिलाता है।

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