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मांड नदी का प्राकृतिक स्वरूप बदला धनवादा पावर ने

DhanwadaPower
  • वन भूमि प्रत्यावर्तन के बिना ही प्लांट लगाने का काम प्रारंभ, कलेक्टर ने एनओसी की शर्तें भी घुमा-फिराकर लिखीं

रायगढ़। महज साढ़े सात मेगावाट के हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट के लिए वन विभाग, सीएसपीडीसीएल और राजस्व विभाग ने मिलकर नियमों को तोड़ा-मरोड़ा। ऐसा तो किसी बड़े थर्मल पावर प्लांट के लिए भी नहीं होता। सोचिए कि इस पावरगेम में कौन मास्टरमाइंड है जो पर्दे के पीछे रहकर पूरे रायगढ़ जिला प्रशासन को हिदायत देता रहा। जबकि कंपनी ने मांड नदी के प्राकृतिक स्वरूप को ही बदल दिया है। धनवादा पावर की महज 7.5 मेगावाट पावर प्रोजेक्ट के लिए नदी, जंगल, जमीन सब कुछ कंपनी के चरणों में अर्पित कर दिया गया। ऐसा जताया गया जैसे यह प्लांट जल्दी नहीं लगा तो आसमान टूट पड़ेगा। कंपनी को तत्कालीन कलेक्टर द्वारा दी गई एनओसी और डीएफओ का पत्र ही पूरी कहानी कह देता है।

कंपनी ने भालूपखना के खनं 347, 365, रैरूमाखुर्द के खनं 29/2, 87/2, 94/2 और चरखापारा के 792/1 में राजस्व वन क्षेत्र में 33 केवी ट्रांसमिशन लाइन बिछाने के लिए तत्कालीन कलेक्टर से एनओसी ली। इन तीनों गांवों में कुल 2.510 हे. पर कलेक्टर ने एनओसी दे दी। शर्त रखी गई कि वन भूमि पर गैर वानिकी प्रयोजन के लिए भूमि प्रत्यावर्तन कराना आवश्यक होगा। यदि वन विभाग भू-प्रत्यावर्तन की कार्यवाही करता है तथा आवेदक कंपनी ग्राम के धार्मिक व सामाजिक विन्यास को प्रभावित नहीं करता तो कलेक्टर कार्यालय को कोई आपत्ति नहीं होगी। दूसरे बिंदु में लिखा गया है कि यदि वन संरक्षण अधिनियम के तहत सक्षम विभाग गैर वानिकी उपयोग के लिए अनुमति देता है तो कोई जिलाधीश कार्यालय को कोई आपत्ति नहीं होगी।

मांड नदी में काम करने के बाद मूल स्वरूप में वापस लाने की शर्त पर एनओसी दी गई थी। मतलब वन विभाग द्वारा भू-प्रत्यावर्तन की कार्यवाही करने के बाद ही काम शुरू किया जाना था। सोचने वाली बात यह है कि कलेक्टर ने 21 जून 2023 को एनओसी दी, लेकिन पीसीसीएफ की आपत्ति 4 जून 2025 को आई। मतलब बीच के दो सालों में कंपनी ने मनमानी करते हुए प्लांट लगाने का काम शुरू कर दिया। वन विभाग और जल संसाधन विभाग की प्रक्रिया पूरी किए बिना ही कंपनी ने अफसरों से सांठगांठ कर प्लांट लगा लिया। 

मांड नदी का नक्शा बदला

इस प्रकरण में डीएफओ द्वारा कलेक्टर को लिखा गया पत्र बेहद संदेहास्पद है। हैरानी की बात है कि डीएफओ ने अपने उच्च कार्यालय को प्रतिलिपि भी नहीं भेजी। वहीं जल संसाधन विभाग की भूमिका भी संदेहास्पद है। मांड नदी की छाती पर कंस्ट्रक्शन किया जाता रहा लेकिन विभाग ने कोई शर्त नहीं लगाई। कलेक्टर की एनओसी में एक बिंदु लिखा गया है कि मांड नदी में काम करने पर जो क्षति होगी, उसे मूल स्वरूप में लाना होगा। मौके पर कंपनी ने मांड नदी का नक्शा ही बदल दिया है।

तहसीलदार ने दिया था पजेशन

तहसीलदार धरमजयगढ़ ने 13 फरवरी 2023 को जमीन पर आधिपत्य सौंपा था जिसमें धनवादा कंपनी के रोहित श्रीवास्तव के साइन हंै। भालुपखना में कुल खनं 10 रकबा 2.167 हे. में शामिल पानी के नीचे मद में दर्ज भूमि खनं 547 रकबा 0.749 हे. में प्राकृतिक स्वरूप को यथावत रखने की शर्त पर 30 वर्ष के लिए भू-आवंटन किया गया था। धनवादा पावर एंड इंफ्रास्ट्रक्चर के प्रतिनिधि रोहित श्रीवास्तव ने पजेशन लिया था,  लेकिन नदी में निर्माण करने की वजह से उस जगह की स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है।

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