- वन विभाग की एनओसी के बिना ही वन भूमि पर काम, हाईकोर्ट में लगी जनहित याचिका
रायगढ़। धरमजयगढ़ ब्लॉक अभी भी विकास से कोसों दूर है। जंगलों से घिरे इलाके में कई कंपनियां चुपचाप अपनी सल्तनत बनाती जा रही हैं जिसमें अफसर खुलकर उनका साथ दे रहे हैं। सरकार ने ही पावर प्रोजेक्ट लगाने, ट्रांसमिशन लाइन बिछाने के लिए नियम बनाए हैं। उन्हीं नियमों को बायपास करने में प्रशासनिक तंत्र मदद कर रहा है। धनवादा कंपनी ने जंगल के अंदर से 33 केवी लाइन बिछा दी जबकि यहां हाथियों की लगातार मौतें हो रही हैं।धरमजयगढ़ के भालूपखना में मांड नदी पर धनवादा पावर की 7.50 मेगावाट लघु जल विद्युत परियोजना लग गई है। बिजली को पावरग्रिड तक लाने के लिए ट्रांसमिशन लाइन की जरूरत पड़ती है।
उस क्षेत्र में छोटे-छोटे गांवों के लिए 11 केवी लाइन बिछाई गई है। सीएसपीडीसीएल ने कुछ समय पहले नए पोल लगाए। मजे की बात यह है कि धनवादा कंपनी ने बिना वन विभाग की अनुमति के उन्हीं खंभों का इस्तेमाल करके 33 केवी के केबल बिछा दिए। यह हाथी प्रभावित क्षेत्र है और वन भूमि पर कोई भी कार्य करने के पूर्व विधिवत अनुमति की जरूरत होती है। वनमंडल में विद्युत करंट की चपेट में आने से कई हाथियों की मौत हो चुकी है लेकिन धुर वन क्षेत्र में 33 केवी केबल बिछाने के पूर्व कोई अनुमति ही नहीं ली गई। बिजली विभाग के 11 केवी पोल पर ही एक निजी लघु जल विद्युत परियोजना को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से 33 केवी केबल लाइन का भी विस्तार किया जा रहा है।
इस मामले में याचिकाकर्ता विवेक कुमार पांडेय ने अपने अधिवक्ता श्रेष्ठ गुप्ता के माध्यम से जनहित याचिका दायर की है। अदालत ने सरकार से जवाब मांगा है। प्रोजेक्ट में निर्माण का ठेका शिवम कंस्ट्रक्शन को मिला था। वन संरक्षण अधिनियम 1980 के प्रावधानों के उल्लंघन का आरोप लगाया गया है ।मिली जानकारी के मुताबिक तत्कालीन वन मंडलाधिकारी धरमजयगढ़ के पत्राचार में यह बात सामने आई है कि परियोजना से संबंधित कुछ कार्यों के लिए वन एवं राजस्व वन क्षेत्र में गैर वानिकी कार्य की कोई अनुमति प्राप्त नहीं हुई थी। राजस्व वन क्षेत्र के खसरा नंबर 347 एवं 365 में कार्य किया गया, जबकि अनुमति ही नहीं थी। सवाल यह है कि क्या कोई भी कंपनपी अपनी मर्जी से किसी भी जमीन पर काम कर सकती है।
किस अफसर की है धनवादा कंपनी
धनवादा कंपनी अचानक से धरमजयगढ़ के जंगल के अंदर मांड नदी पर मात्र 7.5 मेगावाट का हाइड्रो प्रोजेक्ट लगा रही है। यह कंपनी हैदराबाद की है जिसके फाउंडर मुरली कृष्णा धनवादा, राजेंद्र प्रसाद पाकला और श्रीनिवासुलु एंटीबेड्डी हैं। सवाल यह है कि तेलंगाना की एक कंपनी, छग के कोने में आदिवासी क्षेत्र में चुपचाप अपना हाइड्रो प्रोजेक्ट लगा लेती है। इस कंपनी को छग में एंट्री देने के पीछे किस अफसर का दिमाग है? सवाल यह भी है कि क्या किसी बड़े अफसर ने इस प्रोजेक्ट में निवेश किया है?






















