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राठिया ने रावत बनकर बेची जमीन, किसी को पता नहीं चला! पंडो जनजाति की भूमि हड़पने के मामले में एक और ट्विस्ट, साजिश का परत दर परत हो रहा खुलासा

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रायगढ़। असली जाति को छिपाकर खुद आदिवासी बताने के कई मामले लंबित हैं, लेकिन यहां तो उल्टा ही हो गया। एक आदिवासी ने खुद को रावत बताया ताकि जमीन किसी गैर आदिवासी को बेच सके। यह वही जमीन है जो पंडो जनजाति से ली गई थी। आदिवासियों की जमीनें धोखे से खरीदने के लिए दीगर जिलों के सामान्य वर्ग के लोग लगे हुए हैं। इसके लिए साम, दाम, दंड, भेद की रणनीति अपनाई जा रही है। जिस जमीन को हड़पना होता है, उसके पीछे कई साल तक लगे रहते हैं। साजिश का एक प्लान तैयार किया जाता है। बेनामी खरीदी के लिए पहले एक लोकल आदमी को खड़ा किया जाता है। उसके नाम पर रजिस्ट्री होने के बाद फिर उस भूमि को गैर आदिवासी खरीद लेता है।

धरमजयगढ़ में विशेष पिछड़ी जनजाति पंडो की भूमि अब रायपुर के एक गैर आदिवासी सेठ के नाम है। इसके लिए जो साजिश की गई है, वह भूलभुलैया की तरह है। कापू तहसील के डूमरनारा गांव में रुधनी बेवा गिरधारी जाति पंडो के नाम पर खसरा नंबर 409 रकबा 2.104 हे. भूमि थी। यह जमीन बकालो गांव के सुखन पिता बजरंग के नाम हुई। सबसे पहले यह भूमि टेटू पंडो को आवंटित की गई थी। रायपुर की संतोष देवी गुप्ता पति मनोज गुप्ता निवासी अवंति विहार के नाम रजिस्ट्री करवा दी गई।

इस जमीन के साथ डूमरनारा की खनं 438/1 रकबा 0.635 हे. की भी रजिस्ट्री हुई। ये दोनों ही खसरा नंबरों की रजिस्ट्री 21 फरवरी 2024 को हुई। रजिस्ट्री में सुखन पिता बजरंग उम्र 33 वर्ष जाति रावत लिखी गई है, जो ओबीसी कैटेगरी में आता है। जब इसकी पड़ताल की गई तो वह रावत नहीं सुखन राठिया निकला। राशन कार्ड और आधार कार्ड इसकी पुष्टि कर रहे हैं। राशन कार्ड में सुखन राठिया और उसकी पत्नी कमला राठिया का नाम दर्ज है।

फर्जी दस्तावेजों से हुई रजिस्ट्री
पंजीयन विभाग को डिजिटलीकरण से जोड़ा गया है। रजिस्ट्री के समय क्रेता, विक्रेता और गवाहों के पहचान पत्र, बी-वन, पी-2 आदि जमा किए जाते हैं। बी-वन में सुखन पिता बजरंग प्रसाद का पूरा नाम न लिखकर केवल जाति रावत बताई गई है। ऋण पुस्तिका में भी फर्जी जाति डाली गई। फर्जी जाति दिखाकर रजिस्ट्री करवा ली गई और किसी को कानोंकान खबर नहीं हुई। नामांतरण का नोटिस देने और आदेश देने वाले दोनों तहसीलदारों को भी भनक नहीं लगी।

पांच एकड़ से ज्यादा थी जमीन, फिर भी प्राथमिकता राशन कार्ड
इसमें एक और गड़बड़ी की गई। खाद्य विभाग में जानकारी दी गई कि सुखन के पास ढाई एकड़ से कम कृषि भूमि है। वह सीमांत कृषक है इसलिए प्राथमिकता राशन कार्ड बन गया। लेकिन रजिस्ट्री के वाली भूमि ही 6.76 एकड़ हो रही है। मतलब इतनी भूमि का स्वामी होने के बाद भी प्राथमिकता राशनकार्ड बनाया गया।

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