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राष्ट्र की एकता-अखंडता के लिए प्राण न्योछावर करने वाले महामानव पंडित मुखर्जी को श्रद्धांजलि: ओपी चौधरी

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  • “एक विधान, एक निशान, एक प्रधान” के उद्घोषक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जयंती पर ओपी ने किया शत-शत नमन

रायगढ़। राष्ट्रवादी चिंतक, प्रख्यात शिक्षाविद्, प्रखर वक्ता एवं भारतीय जनसंघ के संस्थापक श्रद्धेय डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी की 125वीं जयंती के पावन अवसर पर आज शहीद नंदकुमार पटेल विश्वविद्यालय, रायगढ़ में आयोजित कार्यक्रम में उनके छायाचित्र पर पुष्पांजलि अर्पित कर नमन किया गया। इस दौरान उन्होंने इस क्षण को गौरवशाली बताते हुए कहा कि यह राष्ट्रधर्म के उस अमर पुरोधा के प्रति आत्मिक श्रद्धा का भाव है जिन्होंने “एक देश में दो विधान, दो निशान, दो प्रधान नहीं चलेंगे” का उद्घोष कर भारत की एकता के लिए अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया।

उनके जीवन से जुड़े संस्मरणों पर प्रकाश डालते हुए रायगढ़ विधायक ओपी ने कहा, “एक जीवन, अनेक आयाम: शिक्षा से राष्ट्रसेवा तक।” 6 जुलाई 1901 को कोलकाता में जन्मे डॉ. मुखर्जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। वे मात्र 33 वर्ष की आयु में कलकत्ता विश्वविद्यालय के सबसे युवा कुलपति बने। शिक्षा जगत को उन्होंने राष्ट्र निर्माण की प्रयोगशाला माना। परंतु 1946 में नोआखाली के भीषण हिंदू नरसंहार ने उनके जीवन की दिशा बदल दी। उन्होंने देख लिया कि सत्ता के लिए राष्ट्र की आत्मा से समझौता नहीं किया जा सकता।

स्वतंत्र भारत के प्रथम मंत्रिमंडल में उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री के रूप में उन्होंने ‘चिचरौली खाद कारखाना’ और ‘दामोदर घाटी परियोजना’ जैसी योजनाओं से भारत की औद्योगिक नींव रखी। परंतु नेहरू-लियाकत समझौते और धारा 370 के मुद्दे पर जब उन्होंने देखा कि कश्मीर को भारत से अलग करने का षड्यंत्र रचा जा रहा है, तो उन्होंने 6 अप्रैल 1950 को मंत्रिमंडल से त्यागपत्र दे दिया। उन्होंने सत्ता का मोह छोड़कर राष्ट्रधर्म का मार्ग चुना। 21 अक्टूबर 1951 को दिल्ली में भारतीय जनसंघ की स्थापना कर उन्होंने राष्ट्रवादी राजनीति को वैचारिक विकल्प दिया। उनका स्पष्ट मत था कि राजनीति का उद्देश्य सत्ता प्राप्ति नहीं, राष्ट्र निर्माण होना चाहिए।

जनसंघ के माध्यम से उन्होंने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, अंत्योदय एवं अखंड भारत का मंत्र दिया।
कश्मीर सत्याग्रह में उनके बलिदान की पराकाष्ठा बताते हुए मंत्री चौधरी ने कहा कि डॉ. मुखर्जी के जीवन का सर्वोच्च अध्याय कश्मीर सत्याग्रह है। जब जम्मू-कश्मीर में प्रवेश के लिए ‘परमिट सिस्टम’ लागू था, जब वहाँ भारत का संविधान, सर्वोच्च न्यायालय और राष्ट्रध्वज लागू नहीं होते थे, तब उन्होंने हुंकार भरी- “एक देश में दो विधान, दो निशान, दो प्रधान नहीं चलेंगे।” 8 मई 1953 को उन्होंने बिना परमिट जम्मू-कश्मीर में प्रवेश का निर्णय लिया। 11 मई को उन्हें गिरफ्तार कर श्रीनगर जेल में रखा गया। वे स्वतंत्र भारत के पहले राजनीतिक बलिदानी बने। उनका बलिदान व्यर्थ नहीं गया। 5 अगस्त 2019 को धारा 370 की समाप्ति के साथ उनका स्वप्न साकार हुआ। आज कश्मीर से कन्याकुमारी तक एक विधान, एक निशान, एक प्रधान है।

वर्तमान संदर्भ में डॉ. मुखर्जी की प्रासंगिकता बताते हुए उन्होंने कहा कि आज जब हम डॉ. मुखर्जी की 125वीं जयंती मना रहे हैं, तब हमें सोचना है कि ‘राष्ट्र प्रथम’ का उनका मंत्र कितना प्रासंगिक है। उन्होंने हमें सिखाया कि राष्ट्रनीति, राजनीति से ऊपर है। तुष्टिकरण नहीं, समरसता से राष्ट्र बनता है। शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी नहीं, चरित्र निर्माण है। सत्ता सेवा का माध्यम है, स्वार्थ का नहीं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में आज भारत डॉ. मुखर्जी के सपनों का भारत बन रहा है; सशक्त, स्वाभिमानी और एकजुट भारत। छत्तीसगढ़ में भी सरकार अंत्योदय और सुशासन के उसी मार्ग पर चल रही है।

युवा छात्रों से विशेष आह्वान करते हुए मंत्री ओपी ने कहा कि डॉ. मुखर्जी को आज पुष्पांजलि देते हुए उनके विचारों को जीवन में आत्मसात् भी करें। 33 वर्ष की आयु में कुलपति बनने वाले पंडित श्यामा जी के जीवन से प्रेरणा लेने की अपील करते हुए उन्होंने कहा कि आप सभी राष्ट्र के लिए बड़ा कर दिखाएं। डिग्री के साथ-साथ दिशा भी प्राप्त करें। श्रद्धेय डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के विचार सदा अमर रहेंगे। उनका बलिदान, उनका चिंतन और उनका राष्ट्रधर्म हमें युगों-युगों तक प्रेरित करता रहेगा।

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