रायगढ़। 41वें चक्रधर समारोह की आठवीं संगीत संध्या में कथक विदुषी वासंती वैष्णव और उनके शिष्य-शिष्याओं ने अपनी प्रस्तुति से रायगढ़ घराने की समृद्ध परंपरा को मंच पर साकार किया। लय, ताल, भाव और नृत्यांगों के समन्वय से सजी इस प्रस्तुति को दर्शकों की भरपूर सराहना और तालियां मिलीं। कथक की यह विधा वर्षों से रायगढ़ घराने की पहचान रही है, और इस प्रस्तुति ने उसी परंपरा को नए सिरे से मंच पर उतारा। कलाकारों के पदसंचालन और भाव-प्रदर्शन में घराने की विशिष्ट शैली स्पष्ट रूप से झलकी, जिसने दर्शकों को कार्यक्रम के आरंभ से ही बांधे रखा।
‘गंगा अवतरण’ से शुरुआत, जटिल लयकारी ने बांधा समां
कार्यक्रम का शुभारंभ ठाकुर वेदमणि सिंह की कालजयी रचना ‘गंगा अवतरण’ से हुआ। वासंती वैष्णव के साथ उनके शिष्यों ने मंच पर विशुद्ध रायगढ़ घराने की पारंपरिक शैलियों का प्रदर्शन किया। कलाकारों ने विलास पारण, कृष्ण लास्य त्रोतकम, कड़क बिजली, चमक बिजली, तत्कार और लय बाट जैसी जटिल बंदिशों को प्रस्तुत कर अपने नृत्य कौशल का परिचय दिया। मंच पर प्रस्तुति देने वाले शिष्यों में ज्योतिवैष्णव, सृष्टि गर्ग, ओजस्विता रॉयल, साँईश्री इजारदार, अनन्या श्रीवास, प्रिंसी तिवारी, प्रभ्नूर कौर सलूजा, सिया छत्रे और स्वप्निल बोरकर शामिल रहे। इस सांगीतिक प्रस्तुति का समापन भगवान श्रीकृष्ण पर आधारित भजन ‘ब्रज के नंद लाला, राधा के साँवरिया’ के भावपूर्ण मंचन के साथ हुआ।
कथक साधक फिरतु महाराज की परंपरा से जुड़ी हैं वासंती वैष्णव
रायगढ़ घराने के प्रसिद्ध कथक साधक फिरतु महाराज की पुत्री और प्रमुख शिष्या वासंती वैष्णव ने बाल्यकाल से ही कथक का कड़ा अभ्यास किया है। उन्होंने राममूर्ति वैष्णव और सुनील वैष्णव से भी कथक की बारीकियां सीखी हैं। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना चुकीं वासंती वैष्णव को कला क्षेत्र में योगदान के लिए वर्ष 2014 में छत्तीसगढ़ शासन के चक्रधर सम्मान से सम्मानित किया जा चुका है। वे आज भी अपने शिष्य-शिष्याओं को प्रशिक्षित कर इस घराने की परंपरा को आगे बढ़ा रही हैं।


























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