रायगढ़। ओडिशा और छत्तीसगढ़ की सीमा पर बसे एक गांव में उस समय डर की स्थिति पैदा हो गई, जब एक मकान की नींव के नीचे भारतीय नाग (स्पेक्टेकल कोबरा) का सक्रिय प्रजनन स्थल मिला। मानसून की बारिश से बिलों में पानी भरने के बाद पिछले तीन दिनों से घर के भीतर लगातार जहरीले कोबरा के नवजात बच्चे निकल रहे थे। सूचना मिलते ही रायगढ़ की सर्प रक्षक समिति की टीम सरहद पार कर मौके पर पहुंची और करीब चार घंटे तक चले बेहद चुनौतीपूर्ण रेस्क्यू अभियान में मकान की नींव से 10 जीवित नवजात कोबरा तथा 27 अंडों के अवशेष सुरक्षित बरामद किए। प्रारंभिक जांच में अधिकांश अंडों से बच्चे पहले ही बाहर निकलने की पुष्टि हुई, जिससे आसपास के क्षेत्र में अतिरिक्त सतर्कता बरती जा रही है।यह पूरा मामला रायगढ़ जिले की सीमा से लगे ओडिशा के सुन्दरगढ़ जिले के हमीरपुर ब्लॉक अंतर्गत स्थित सीमावर्ती गांव कांदादोड़ा का है
तीन दिन तक घर में दिखते रहे बेबी कोबरा
गांव के जगतराय भोय के परिवार ने पहले दिन घर के भीतर एक छोटा कोबरा देखा। परिवार को लगा कि बारिश के कारण कोई सांप गलती से घर में आ गया होगा। अगले दिन फिर एक और नवजात कोबरा दिखाई दिया। तीसरे दिन भी जब घर के दूसरे हिस्से में बेबी कोबरा रेंगता मिला, तब परिवार की चिंता भय में बदल गई। लगातार तीन दिनों तक जहरीले सांप के बच्चों का घर के भीतर निकलना इस बात का संकेत था कि आसपास कहीं अंडों का पूरा समूह मौजूद हो सकता है। परिवार ने घबराहट में कोई गलत कदम नहीं उठाया। सांपों को मारने के बजाय सुरक्षित रेस्क्यू कराने का निर्णय लिया गया। हमीरपुर निवासी राहुल यादव के माध्यम से रायगढ़ की सर्प रक्षक समिति के सदस्य रवि मिरि से संपर्क किया गया। सूचना मिलते ही समिति के संरक्षक विनितेश तिवारी ने मामले की गंभीरता को देखते हुए इसे संभावित नेस्टिंग साइट मानकर तत्काल विशेषज्ञ टीम को रवाना कर दिया।
रायगढ़ से पहुंची सर्पमित्र टीम, शुरू हुआ हाई-रिस्क ऑपरेशन
विनितेश तिवारी के नेतृत्व में रवि मिरि, सुमित बेहरा और विक्की चौहान की चार सदस्यीय टीम मौके पर पहुंची। प्रारंभिक निरीक्षण में ही साफ हो गया कि सांपों की गतिविधि मकान की मुख्य दीवार और उसकी नींव के नीचे केंद्रित है। ऊपर बड़े-बड़े पत्थर दबे हुए थे और जगह इतनी संकरी थी कि वहां किसी भारी मशीन या औजार का इस्तेमाल करना जोखिम भरा था। जरा-सी लापरवाही दीवार को नुकसान पहुंचा सकती थी और भीतर मौजूद सांप भी इधर-उधर फैल सकते थे। ऐसे में टीम ने पूरी सावधानी के साथ हाथों और स्नेक रेस्क्यू उपकरणों की मदद से ऑपरेशन शुरू किया। हैवी लेदर ग्लव्स पहनकर सदस्य एक-एक कर भारी पत्थर हटाने लगे। हर पत्थर के साथ मिट्टी भी धंस रही थी और हर पल इस बात का खतरा बना हुआ था कि कहीं भीतर छिपा कोबरा अचानक बाहर न निकल आए। आसपास बड़ी संख्या में ग्रामीण जमा हो चुके थे और पूरे ऑपरेशन पर उनकी नजरें टिकी थीं।
नींव खुलते ही सामने आया भारतीय नाग का पूरा प्रजनन स्थल
करीब दो फीट गहराई तक खुदाई करने के बाद जैसे ही एक बड़ा पत्थर हटाया गया, वहां मौजूद टीम को पहली बड़ी सफलता मिली। पत्थरों और मिट्टी के बीच कई सफेद केंचुलियां दिखाई दीं, जो इस बात का संकेत थीं कि यह जगह लंबे समय से सांपों के उपयोग में रही है। अनुभवी रेस्क्यू टीम ने तुरंत समझ लिया कि वे किसी सामान्य बिल के सामने नहीं, बल्कि भारतीय नाग के सक्रिय प्रजनन स्थल तक पहुंच चुके हैं। इसके बाद खुदाई और भी सावधानी से की गई। मिट्टी हटते ही दरारों के भीतर हलचल दिखाई देने लगी। कुछ ही क्षणों बाद पहला नवजात कोबरा बाहर निकला। आकार छोटा होने के बावजूद उसका व्यवहार पूरी तरह वयस्क कोबरा जैसा था। उसने फन उठाकर फुफकारना शुरू कर दिया। टीम जैसे ही उसे सुरक्षित पकड़ने आगे बढ़ी, उसने सीधे दस्ताने पर ही दंश मारने का प्रयास किया।
दस्तानों पर करते रहे हमला, एक-एक कर निकले 10 नवजात कोबरा
रेस्क्यू का सबसे चुनौतीपूर्ण दौर अब शुरू हो चुका था। एक बच्चे को सुरक्षित पकड़ने के बाद कुछ ही देर में उसी खोह से दूसरा और फिर तीसरा नवजात बाहर निकल आया। कई बच्चे मिट्टी की संकरी दरारों में छिपे हुए थे। जगह इतनी सीमित थी कि कई बार स्नेक हुक का पूरा इस्तेमाल भी संभव नहीं हो पा रहा था। ऐसे में टीम को घुटनों के बल बैठकर हाथों और उपकरणों की मदद से एक-एक बच्चे को सावधानी से बाहर निकालना पड़ा। बाहर निकलने के बाद कई नवजात कोबरा लगातार फन उठाकर दस्ताने पहने हाथों पर हमला करने की कोशिश कर रहे थे। आकार छोटा होने के बावजूद उनकी फुर्ती और आक्रामकता किसी भी तरह कम नहीं थी। यदि बिना अनुभव वाला व्यक्ति ऐसी स्थिति में पहुंचता, तो हादसा होना तय था। लगभग चार घंटे तक चले इस ऑपरेशन के बाद टीम ने 10 जीवित नवजात भारतीय नाग सुरक्षित बाहर निकाल लिए। सभी बच्चों को विशेष प्लास्टिक जार में रखा गया ताकि उन्हें बिना किसी नुकसान के प्राकृतिक आवास तक पहुंचाया जा सके। खुदाई के दौरान वहीं 27 अंडों का समूह भी मिला। अधिकांश अंडों के खोल खाली थे, जिससे स्पष्ट हो गया कि कई बच्चे पहले ही निकलकर आसपास फैल चुके हैं। यही वजह थी कि पिछले तीन दिनों से घर के अलग-अलग हिस्सों में लगातार बेबी कोबरा दिखाई दे रहे थे।
हैचिंग के समय जगह छोड़ देती है मादा कोबरा
रेस्क्यू के दौरान सबसे ज्यादा चर्चा इसी बात की रही कि जब एक ही जगह इतने नवजात कोबरा और अंडे मिले, तब वहां वयस्क मादा कोबरा क्यों नहीं दिखाई दी। मौके पर मौजूद ग्रामीणों ने भी यही सवाल टीम से पूछा। इस पर सर्प रक्षक समिति के संरक्षक विनितेश तिवारी ने भारतीय नाग के व्यवहार से जुड़ी महत्वपूर्ण वैज्ञानिक जानकारी साझा की। उन्होंने बताया कि मादा भारतीय नाग अंडे देने के बाद लंबे समय तक उनकी सुरक्षा करती है और आसपास ही रहती है, लेकिन जैसे ही अंडों से बच्चों के बाहर आने (हैचिंग) का समय आता है, वह सामान्यतः उस स्थान को छोड़ देती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि अंडों की रखवाली के दौरान वह लंबे समय तक भोजन नहीं कर पाती। भूख की स्थिति में नवजात बच्चे उसके लिए आसान शिकार बन सकते हैं। प्रकृति ने इसी कारण उसके व्यवहार को इस तरह विकसित किया है कि बच्चों के बाहर निकलने से पहले या उसी दौरान वह वहां से दूर चली जाती है। यही वजह रही कि रेस्क्यू के दौरान नींव के नीचे केवल अंडों के खोल और नवजात कोबरा मिले, जबकि मादा कोबरा वहां मौजूद नहीं थी।
वीडियो में कैद हुआ पूरा ऑपरेशन, हर पत्थर हटने के साथ बढ़ता गया रोमांच
करीब चार घंटे तक चले इस अभियान के दौरान टीम ने अत्यंत संयम के साथ हर चरण को पूरा किया। नींव के नीचे बने संकरे स्थान में काम करना आसान नहीं था। कई बार पत्थर हटाते ही मिट्टी खिसक जाती थी और दरारों के भीतर हलचल शुरू हो जाती थी। जैसे ही एक नवजात कोबरा बाहर निकलता, टीम उसे सुरक्षित नियंत्रित करती और उसी दौरान दूसरी दरार से एक और बच्चा बाहर दिखाई देने लगता। मौके पर मौजूद ग्रामीण पूरे ऑपरेशन को सांस रोककर देखते रहे। बच्चों और महिलाओं को सुरक्षित दूरी पर रखा गया, जबकि टीम के सदस्य बिना घबराए लगातार रेस्क्यू में जुटे रहे। रेस्क्यू के दौरान मिली सफेद केंचुलियां इस बात का भी प्रमाण थीं कि यह स्थान केवल अस्थायी ठिकाना नहीं, बल्कि भारतीय नाग का सक्रिय प्रजनन स्थल था। समिति के अनुसार इस तरह के मामले बहुत कम देखने को मिलते हैं, जहां एक ही जगह से इतने नवजात और अंडों के अवशेष एक साथ मिलें।
ऊषाकोठी वन क्षेत्र में सुरक्षित छोड़े गए बेबी कोबरा
रेस्क्यू पूरा होने के बाद टीम सभी 10 नवजात कोबरा को सुरक्षित कंटेनर में रखकर हमीरपुर के घने ऊषाकोठी वन क्षेत्र पहुंची। ऐसे स्थान का चयन किया गया, जहां मानव आबादी न हो और सांपों को प्राकृतिक वातावरण मिल सके। जैसे ही कंटेनर का ढक्कन खोला गया, सभी नवजात तेजी से बाहर निकले और कुछ ही सेकंड में पथरीली दरारों तथा जंगल की झाड़ियों के बीच ओझल हो गए। समिति का कहना है कि किसी भी वन्यजीव के रेस्क्यू का उद्देश्य उसे पकड़ना नहीं, बल्कि सुरक्षित तरीके से उसके प्राकृतिक आवास में वापस पहुंचाना होता है। इसलिए रेस्क्यू के बाद उचित स्थान पर छोड़ना पूरी प्रक्रिया का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है।
ओडिशा में ऑपरेशन चलता रहा, रायगढ़ में भी जारी रही रेस्क्यू सेवा
सर्प रक्षक समिति की पूरी टीम ओडिशा में व्यस्त थी, लेकिन इस दौरान रायगढ़ शहर की आपातकालीन सेवाओं को प्रभावित नहीं होने दिया गया। समिति ने स्थानीय मोर्चे की जिम्मेदारी जय नारायण खर्रा को सौंपी। इसी बीच उसी शाम अतरमुड़ा रोड स्थित उमेश कुमार चौधरी के बेडरूम में करीब पांच फीट लंबा वयस्क कोबरा निकल आया। सूचना मिलते ही जय नारायण खर्रा मौके पर पहुंचे और सुरक्षित रेस्क्यू कर सांप को जंगल में छोड़ दिया। इस तरह एक ही दिन समिति ने दो अलग-अलग स्थानों पर महत्वपूर्ण रेस्क्यू ऑपरेशन सफलतापूर्वक पूरे किए।
बरसात शुरू होते ही बढ़े सर्प रेस्क्यू, रोजाना आ रहे 40 से 50 कॉल
विनितेश तिवारी ने बताया कि मानसून शुरू होने के साथ ही सर्प रेस्क्यू के मामलों में तेजी से वृद्धि हुई है। लगातार बारिश के कारण बिलों में पानी भर जाता है, जिससे सांप सूखी और सुरक्षित जगहों की तलाश में घरों, गोदामों, लकड़ी के ढेर, खपरों और अन्य रिहायशी स्थानों की ओर आने लगते हैं। उन्होंने बताया कि इन दिनों सर्प रक्षक समिति को प्रतिदिन औसतन 40 से 50 रेस्क्यू कॉल प्राप्त हो रहे हैं। टीम सबसे पहले अत्यधिक विषैले सांपों से जुड़े मामलों को प्राथमिकता देती है, ताकि जनहानि की संभावना को रोका जा सके। अन्य मामलों में उपलब्ध टीम के अनुसार क्रमवार कार्रवाई की जाती है।
सांप दिखे तो घबराएं नहीं, व्हाट्सएप पर भेजें फोटो या वीडियो
समिति ने लोगों से अपील की है कि सांप दिखाई देने पर उसे मारने या खुद पकड़ने का प्रयास न करें। सबसे पहले सुरक्षित दूरी बनाएं और यदि संभव हो तो बिना जोखिम उठाए उसकी फोटो या 30 से 40 सेकंड का छोटा वीडियो बना लें। इससे रेस्क्यू टीम मौके पर पहुंचने से पहले ही सांप की संभावित प्रजाति पहचानकर जरूरी सलाह दे सकती है। सर्प रक्षक समिति, रायगढ़ की व्हाट्सएप हेल्पलाइन: 9993032232
बरसात में घरों के आसपास रखें ये सावधानियां
सर्प रक्षक समिति ने लोगों से अपील की है कि बारिश के मौसम में थोड़ी-सी सावधानी बड़ी दुर्घटना को टाल सकती है। सांप आमतौर पर इंसानों पर हमला करने नहीं आते, बल्कि सुरक्षित और सूखी जगह की तलाश में रिहायशी इलाकों तक पहुंच जाते हैं। ऐसे में घर और आसपास का वातावरण साफ-सुथरा रखना सबसे प्रभावी बचाव माना जाता है। समिति ने लोगों को निम्नलिखित सावधानियां अपनाने की सलाह दी है –
- घर के आसपास झाड़ियां, घास, लकड़ियां, ईंट, खपरे या कबाड़ का ढेर जमा न होने दें।
- चूहों के बिल, दीवारों की दरारें और फर्श के छेद तुरंत सीमेंट से बंद कर दें। सांप अक्सर चूहों का पीछा करते हुए इन्हीं रास्तों से घरों में प्रवेश करते हैं।
- नालियों, स्टोर रूम और अंधेरे कोनों की नियमित सफाई करें।
- रात के समय घर के बाहर निकलने से पहले टॉर्च का उपयोग करें।
- ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोग जमीन पर सोने से बचें और मच्छरदानी का उपयोग करें।
- खेत, बाड़ी या लकड़ी के ढेर में हाथ डालने से पहले डंडे से जांच कर लें।
- बच्चों को नंगे पैर झाड़ियों या घास वाले क्षेत्रों में खेलने से रोकें।
सर्पदंश होने पर घबराएं नहीं, सही प्राथमिक उपचार ही बचा सकता है जान
विनितेश तिवारी ने बताया कि अधिकांश मामलों में लोग सांप के जहर से कम और घबराहट या गलत प्राथमिक उपचार के कारण ज्यादा गंभीर स्थिति में पहुंच जाते हैं। इसलिए सर्पदंश होने पर सबसे पहले मरीज को शांत रखना जरूरी है। उन्होंने बताया कि जहर का प्रभाव कई बातों पर निर्भर करता है, जैसे सांप की प्रजाति, शरीर में प्रवेश किए जहर की मात्रा, व्यक्ति की उम्र, वजन और दंश का स्थान। यदि हाथ या पैर में काटा गया हो तो कई मामलों में समय पर अस्पताल पहुंचने का अवसर मिल जाता है, लेकिन गर्दन, छाती या चेहरे जैसे हिस्सों पर दंश अधिक खतरनाक हो सकता है। इसलिए हर स्थिति में बिना समय गंवाए मरीज को अस्पताल पहुंचाना सबसे जरूरी कदम है।
भूलकर भी न करें ये गलतियां
सर्पदंश की स्थिति में अक्सर लोग घबराहट में ऐसे कदम उठा लेते हैं, जो मरीज के लिए और अधिक नुकसानदेह साबित हो सकते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार इन गलतियों से हर हाल में बचना चाहिए—
- काटे गए स्थान पर ब्लेड या चाकू से चीरा न लगाएं।
- मुंह से जहर चूसने की कोशिश न करें।
- रस्सी, तार या कपड़े से अंग को बहुत कसकर न बांधें।
- मरीज को दौड़ाने या ज्यादा चलाने की गलती न करें।
- झाड़-फूंक, तंत्र-मंत्र या घरेलू नुस्खों में समय बर्बाद न करें।
- किसी भी स्थिति में इलाज में देरी न करें।
समिति का कहना है कि मरीज को जितना संभव हो शांत रखें, प्रभावित अंग को कम से कम हिलाएं और तत्काल नजदीकी जिला अस्पताल या मेडिकल कॉलेज लेकर जाएं, जहां एंटी-स्नेक वेनम (ASV) निशुल्क उपलब्ध रहता है।
सांप दिखे तो मारें नहीं, विशेषज्ञों को दें सूचना
सर्प रक्षक समिति ने लोगों से अपील की है कि सांप चाहे जहरीला हो या बिना जहर वाला, उसे मारने की कोशिश न करें। अधिकांश मामलों में सांप आत्मरक्षा में हमला करता है। यदि किसी घर, खेत, दुकान या परिसर में सांप दिखाई दे तो सुरक्षित दूरी बनाकर तुरंत उसकी फोटो या 30 से 40 सेकंड का वीडियो बनाएं और समिति के व्हाट्सएप नंबर 9993032232 पर भेज दें। इससे टीम पहले ही संभावित प्रजाति की पहचान कर आवश्यक निर्देश दे सकेगी और जरूरत पड़ने पर तत्काल रेस्क्यू दल मौके पर रवाना किया जाएगा।





















