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सब्सिडी लेने के बाद बंद हो रहे ब्रिक्स प्लांट, राखड़ का इस्तेमाल घटा

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  • फ्लाईएश ब्रिक्स प्लांट लगाने के लिए उद्योग विभाग ने मनमानी बांटी है सब्सिडी
  • करोड़ों रुपए पाकर दो साल भी नहीं चलते प्लांट

रायगढ़, (केलो प्रवाह)। पिछले चार-पांच सालों से रायगढ़ और सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले में फ्लाईएश ब्रिक्स प्लांट लगाने के नाम पर जबर्दस्त खेल हो रहा है। उद्योग विभाग भी इसमें शामिल है। मुंहमांगी सब्सिडी देने के बाद ये प्लांट बंद हो जाते हैं। यही वजह है कि पिछले दो साल में इन प्लांटों में एश की खपत में साढ़े चार लाख टन की कमी आ गई। औद्योगिक नीति 2019-24 के तहत जो सब्सिडी दी गई है, उनमें बड़ी संख्या फ्लाईएश ब्रिक्स प्लांटों की थी। फ्लाईएश ब्रिक्स यूनिटों को भारी-भरकम सब्सिडी मंजूर की गई है। फ्लाईएश ब्रिक्स प्लांट एक पहेली की तरह है। पहले ब्रिक्स प्लांट के लिए कैपिटल सब्सिडी और इंटरेस्ट सब्सिडी हासिल की जाती है।

एक बार सब्सिडी मिल गई, तो फिर प्लांट चल रहा है या नहीं, किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता। जिन प्लांटों को दो-तीन साल पहले सब्सिडी मिल चुकी है, वे अब किस स्थिति में हैं, उद्योग विभाग को मालूम ही नहीं। फ्लाईएश का यूटिलाइजेशन करने के लिए ये ब्रिक्स प्लांट बड़ी अहम भूमिका निभाते हैं। इसीलिए सरकार ने इनको प्राथमिकता दी है। सब्सिडी देने में कोई कमी नहीं की गई है। वर्ष 2024-25 में रायगढ़ जिले में ब्रिक्स प्लांटों को 16,55,457 टन फ्लाईएश की सप्लाई की गई थी। इतना एश ईंट बनाने में उपयोग किया गया। वर्ष 2025-26 में यह मात्रा घटकर 11,96,554 टन पहुंच गई। करीब साढ़े चार लाख टन एश कम भेजा गया। मतलब मांग में कमी हो गई, जबकि ब्रिक्स प्लांटों की संख्या और उत्पादन क्षमता बढ़ी है।

लागत से ज्यादा देते हैं सब्सिडी

उद्योग विभाग से ब्याज अनुदान और पूंजीगत अनुदान में लाखों रुपए हासिल करने के बाद फ्लाईएश ब्रिक्स प्लांट का काम पूरा हो जाता है। दरअसल इन यूनिटों की लागत जानबूझकर बहुत ज्यादा बताई जाती है। बिलों की जांच किए बिना ही पास कर दिया जाता है। लेबर और मटेरियल बिलों में तो सबसे ज्यादा गड़बड़ी होती है। सब्सिडी मिलने के दो साल में ही उसी जमीन पर ब्रिक्स प्लांट की जगह दूसरा कारोबार खड़ा हो जाता है।

ब्रिक्स बनाने में इस्तेमाल हुआ एश

वर्ष           | ब्रिक्स बनाने में लगा एश
2021-22 | 8,59,426 टन
2022-23 | 8,22,016 टन
2024-25 | 16,55,457 टन
2025-26 | 11,96,554 टन

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Editorial

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