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ममता बनर्जी के इस्तीफा न देने से क्या होगा असर? हठधर्मिता या संवैधानिक संकट.. जानें प्लान B और एक्सपर्ट राय

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न्यूज डेस्क। पश्चिम बंगाल के चुनावी नतीजों के बाद राज्य की सियासत एक ऐसे मोड़ पर खड़ी दिख रही है जहाँ लोकतांत्रिक परंपराएं और व्यक्तिगत जिद आमने-सामने हैं। भाजपा की जीत और तृणमूल कांग्रेस की हार के बावजूद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा इस्तीफा न देने के संकेतों ने एक नई बहस छेड़ दी है। राजनीतिक गलियारों में यह सवाल गूंज रहा है कि क्या कोई मुख्यमंत्री जनादेश के खिलाफ जाकर पद पर बना रह सकता है? हालांकि संविधान विशेषज्ञों और कानूनी जानकारों की मानें तो लोकतंत्र में ऐसी ‘जिद’ का कानूनी रूप से कोई वजूद नहीं है। राज्यसभा के पूर्व सेकरेट्री जनरल योगेन्द्र नारायण का कहना है कि किसी मुख्यमंत्री के इस्तीफा देने या न देने से सरकार गठन की प्रक्रिया पर कोई असर नहीं पड़ता।

चुनाव के बाद जिस दल को जनता ने बहुमत दिया है, वह सीधे राज्यपाल के पास जाकर सरकार बनाने का दावा पेश कर सकता है और राज्यपाल उसे शपथ दिलाने के लिए बाध्य हैं। संवैधानिक प्रावधानों पर गौर करें तो मामला और भी स्पष्ट हो जाता है। इलाहाबाद हाई कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश एसआर सिंह के अनुसार, संविधान का अनुच्छेद 172 (1) साफ तौर पर कहता है कि विधानसभा का कार्यकाल पांच वर्ष का होता है और यह समय पूरा होते ही सदन भंग माना जाता है। तकनीकी रूप से जब विधानसभा ही अस्तित्व में नहीं रहती, तो मुख्यमंत्री और उनके मंत्रिमंडल की शक्तियां स्वतः समाप्त हो जाती हैं।

ऐसे में इस्तीफा देना महज एक औपचारिकता रह जाता है, जिसे निभाना हर उस व्यक्ति का कर्तव्य है जिसने संविधान की शपथ ली है। सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील सुशील जैन तो यहाँ तक कहते हैं कि यदि ऐसी कोई असाधारण स्थिति पैदा होती है जहाँ निवर्तमान मुख्यमंत्री पद छोड़ने से इनकार कर दे, तो राज्यपाल के पास उन्हें बर्खास्त करने का पूर्ण अधिकार सुरक्षित है। हाल के वर्षों में भारतीय राजनीति में ‘इस्तीफा न देने’ का एक नया चलन देखने को मिला है, जिसका उदाहरण दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के समय भी दिखा था। लेकिन विशेषज्ञों का तर्क है कि वह स्थिति अलग थी क्योंकि तब सरकार के पास सदन में बहुमत मौजूद था।

चुनाव हारने के बाद स्थिति बिल्कुल उलट होती है। हार के बाद इस्तीफा न देना केवल एक राजनीतिक संदेश हो सकता है, लेकिन यह नई सरकार के गठन को रोकने का कानूनी आधार नहीं बन सकता। अंततः, लोकतंत्र में जनता का फैसला ही सर्वोपरि होता है और संवैधानिक व्यवस्थाएं यह सुनिश्चित करती हैं कि सत्ता का हस्तांतरण बिना किसी बाधा के संपन्न हो।

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विकास पाण्डेय

एडिटर - वेब एवं डिजिटल

विकास पाण्डेय अक्टूबर 2021 से 'केलो प्रवाह' के साथ जुड़े हैं और डिजिटल विंग के संचालन एवं संपादन की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। रायगढ़ और छत्तीसगढ़ के प्रमुख घटनाक्रम, जनहित के मुद्दों और स्थानीय सरोकारों पर रिपोर्टिंग करते हैं। उन्होंने RIG24 मीडिया नेटवर्क से पत्रकारिता की शुरुआत की और इसी दौरान BJMC की डिग्री हासिल की।

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