न्यूज डेस्क। हिंदू धर्म में सोमवती अमावस्या का अत्यंत विशेष महत्व है। जब अमावस्या तिथि सोमवार के दिन पड़ती है, तो इसे सोमवती अमावस्या कहा जाता है। भगवान शिव और चंद्रदेव को समर्पित इस दिन की गई साधना, व्रत, दान और पूजा को अत्यंत प्रभावशाली और पुण्यदायी माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन विधि-विधान से की गई उपासना व्यक्ति के जीवन में सुख, समृद्धि और सफलता का मार्ग प्रशस्त करती है। वर्ष 2026 में सोमवती अमावस्या 15 जून, सोमवार को मनाई जाएगी।
स्नान-दान का शुभ मुहूर्त और ग्रहों का योग
द्रिक पंचांग के अनुसार, सोमवती अमावस्या के दिन स्नान और दान का शुभ मुहूर्त प्रातः 4 बजकर 03 मिनट से लेकर 4 बजकर 43 मिनट तक रहेगा। इस दिन की महत्ता को बढ़ाने के लिए सर्वार्थ सिद्धि योग और अमृत सिद्धि योग का विशेष संयोग बन रहा है। यह योग सुबह 5 बजकर 23 मिनट से प्रारंभ होकर शाम 7 बजकर 08 मिनट तक रहेगा। ज्योतिषीय दृष्टि से इन योगों को अत्यंत शुभ माना गया है और इनके दौरान किए गए किसी भी प्रकार के धार्मिक कार्यों का विशेष फल प्राप्त होता है।
शिवलिंग श्रृंगार और बिल्व पत्र का विशेष महत्व
सोमवती अमावस्या पर भगवान शिव की पूजा का विधान सबसे प्रमुख है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन पांच पत्तों वाला बिल्व पत्र मिलना अत्यंत दुर्लभ और शुभ माना जाता है। पूजा के दौरान, तीन पत्तों पर “नमः शिवाय” और 108 बिल्व पत्रों पर केसर तथा चंदन से “राम-राम” लिखकर भगवान शिव के शिवलिंग का श्रृंगार और महाभिषेक करने से साधक की मनोकामनाएं पूर्ण हो सकती हैं। चार पत्तों वाला बिल्व पत्र भी शुभता और पुण्य प्रदान करने वाला माना गया है।
पूजा में वस्त्रों के रंग की भूमिका
शास्त्रों के अनुसार, पूजा के दौरान पहने जाने वाले वस्त्रों का रंग भी व्यक्ति के जीवन पर प्रभाव डालता है। मान्यता है कि पीले वस्त्र धारण कर पूजा करने से रोगों से मुक्ति का आशीर्वाद प्राप्त होता है, जबकि सफेद वस्त्र ज्ञान और विद्या का प्रतीक हैं। लाल रंग को सिद्धियों और ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करने वाला माना गया है। वहीं, यदि कोई ग्रह बाधाओं से परेशान है या आर्थिक समृद्धि प्राप्त करना चाहता है, तो काले वस्त्रों का उपयोग सहायक माना गया है। हालांकि, धर्माचार्य यह स्पष्ट करते हैं कि किसी भी विशेष साधना या उपाय को करने से पहले किसी जानकार व्यक्ति का मार्गदर्शन अवश्य लें, क्योंकि बिना सही जानकारी के किए गए धार्मिक प्रयोगों का अपेक्षित फल नहीं मिलता।
तुलसी पूजा और दाम्पत्य जीवन के उपाय
सोमवती अमावस्या की शाम को स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करने के बाद तुलसी पूजा का विशेष महत्व है। तुलसी के पौधे के नीचे गाय के घी का दीपक जलाकर रोली, अक्षत, धूप और दीप से पूजा की जाती है। इस दौरान पान के पत्ते पर धान और साबुत हल्दी रखकर तुलसी के पास अर्पित करें और परिक्रमा करें। साथ ही “नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप करते हुए धन और सुख की प्रार्थना की जाती है। इसके अलावा, वैवाहिक जीवन की समस्याओं को दूर करने के लिए पीपल के वृक्ष की जड़ में जल और पुष्प अर्पित करने का विधान है। पीपल की नौ बार परिक्रमा करें और प्रत्येक परिक्रमा के साथ पीले रंग का सूत लपेटें। मान्यता है कि यह उपाय दाम्पत्य जीवन में मधुरता और तनाव को कम करने में सहायक है।
पितृ शांति, राहु दोष निवारण और पीपल का महत्व
अमावस्या तिथि पितरों के तर्पण के लिए भी जानी जाती है। इस दिन चावल, दूध और चीनी से बनी खीर तैयार कर मिट्टी के पात्र में रखें और उसे दक्षिण दिशा की ओर स्थापित करें। “पितृभ्यो नमः” मंत्र का जाप करते हुए पितरों का स्मरण करें और पूजा के बाद यह खीर किसी जरूरतमंद व्यक्ति को दान कर दें। इससे पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है और कुंडली में राहु के अशुभ प्रभाव शांत होते हैं। इसके साथ ही, यदि संभव हो तो इस दिन पीपल का पौधा लगाना भी अत्यंत शुभ माना गया है, जिससे परिवार में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। मौन व्रत, मंत्र जाप और दान-पुण्य जैसे कार्य भी इस दिन विशेष फलदायी होते हैं।






















