रायगढ़, (केलो प्रवाह)। धरमजयगढ़ में ऐसे करीब दर्जन भर भूमाफियाओं का पता चला है जिन्होंने बिना किसी आधार के दूसरे शरणार्थियों को आवंटित जमीनें हड़प ली हैं। पिछली बार की तरह इस बार भी हड़पी गई जमीन पर धान बेचने के लिए पंजीयन कराया जा रहा है। राजस्व विभाग ने ऐसे लोगों की पहचान के लिए जांच नहीं की है। धान बेचने के लिए किसान पंजीयन में पुराना डाटा कैरी फारवर्ड हो रहा है। एग्रीस्टेक और डीसीएस से केवल पांच प्रश गड़बड़ी रुकेगी।
धरमजयगढ़ में महावीर बैरागी का मामला सामने आया है जिसमें कृषि कार्य के लिए दी गई भूमि को अपने नाम कराने के बाद डायवर्सन भी करवा लिया गया। जांच हुई तो पता चला कि महावीर ने दूसरे शरणार्थियों की करीब 40 एकड़ भूमि हथियाई है। मामला खुलने के बाद कलेक्टर ने जांच प्रतिवेदन और सभी खसरों के दस्तावेज मंगवाए थे। कलेक्टर कोर्ट में प्रकरण पंजीबद्ध किया गया है। सारी जमीनें कैसे महावीर के नाम हुईं, इसका इतिहास निकाला जाएगा। महावीर ने धरमजयगढ़ कॉलोनी में खनं 114/ 1 रकबा 2.0240 हे. को हड़पने के बाद
आईसीआईसीआई बैंक से 40 लाख का लोन भी लिया है। इसी तरह बायसी में खनं 80/ 1/क/ 14 रकबा 1.5210 हे. को भी आईसीआईसीआई बैंक में ही बंधक रखकर लाखों रुपए लिए गए हैं। हैरानी की बात यह है कि सभी कृषि जमीनों पर धान की फसल लगाकर 600 क्विंटल धान बेचा था। इस बार भी वही जमीनें वापस से धान बेचने के लिए पंजीकृत होंगी। इधर कलेक्टर कोर्ट में प्रकरण चलता रहेगा और उधर महावीर जैसे लोग दूसरे को आवंटित भूमि पर लाखों का धान बेचते रहेंगे।
एक-दो नहीं दर्जनों दलाल सक्रिय
धरमजयगढ़ शहर और आसपास के इलाके की डेमोग्राफी पिछले 30-40 साल में पूरी तरह बदल चुकी है। जो मूल निवासी 1980 के पहले रहते थे, उनका प्रतिशत कम हो चुका है। कोयला खदानों के लिए जमीनों का अधिग्रहण करना बेहद मुश्किल हो चुका है। जमीनों पर अवैध शेड, गोदाम का निर्माण हो चुका है। इसका मुआवजा मिलने पर ही जमीन देने की शर्त रखी जा रही है। ठेके पर भू-अर्जन के मामले लिए जा रहे हैं। दर्जनों दलाल इस खेल में सक्रिय हैं। स्थानीय मूल आदिवासी गायब हो चुका है।























