रायगढ़। जिले के लैलूंगा विकासखंड में किसानों ने धान की परंपरागत खेती के स्थान पर सन की खेती अपनाकर फसल विविधीकरण की दिशा में नई पहल की है। टिकरा जमीन पर बीज उत्पादन कार्यक्रम के तहत की गई इस खेती से किसानों के खेतों में फसल लहलहा रही है, जिससे क्षेत्र के अन्य किसान भी कम पानी वाली जमीनों पर वैकल्पिक खेती की ओर आकर्षित हो रहे हैं।
बीज उत्पादन कार्यक्रम से जुड़े दो किसान
लैलूंगा विकासखंड के ग्राम केंदाटिकरा निवासी सुखदेव सिदार और ग्राम लैलूंगा के चंद्रशेखर पटेल ने धान का रकबा घटाकर अपनी टिकरा जमीन पर सन की फसल लगाई है। दोनों किसानों ने बीज उत्पादन कार्यक्रम के तहत यह कदम उठाया है, जिससे तैयार होने वाली उपज को बीज के रूप में सीधे बीज निगम को उपलब्ध कराने का अवसर मिलेगा।
रेशे से रस्सी और मिट्टी के लिए हरी खाद का लाभ
सन की फसल केवल बीज उत्पादन तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसके बहुआयामी उपयोग हैं। इसके तने से निकलने वाले रेशों से मजबूत रस्सियां बनाई जाती हैं, जिनका उपयोग बोरियों के निर्माण और खाट की बुनाई सहित कई दैनिक कार्यों में किया जाता है। इसके अलावा, सन की हरी फसल को खेत की मिट्टी में जोतकर मिलाने से यह बेहतरीन हरी खाद का काम करती है। इससे जमीन में जैविक कार्बन और आवश्यक पोषक तत्व बढ़ते हैं, जिससे अगली फसलों के लिए रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने में मदद मिलती है।
कृषक उन्नति योजना से प्रति एकड़ 15 हजार रुपये प्रोत्साहन
जिला प्रशासन किसानों को जमीन की प्रकृति और पानी की उपलब्धता के अनुसार फसल चक्र अपनाने के लिए प्रेरित कर रहा है। इसी क्रम में धान का रकबा कम कर वैकल्पिक फसलें लगाने वाले किसानों को समर्थन दिया जा रहा है।

राज्य शासन की कृषक उन्नति योजना के तहत धान के बदले निर्धारित वैकल्पिक फसल लेने वाले पात्र किसानों को प्रति एकड़ 15 हजार रुपये का आर्थिक लाभ देने का प्रावधान है। सुखदेव सिदार और चंद्रशेखर पटेल द्वारा धान का रकबा कम कर सन की खेती किए जाने के बाद, योजना के तय नियमों व पात्रता को पूरा करने पर उन्हें इस प्रोत्साहन राशि का लाभ प्रदान किया जाएगा।

























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