रायगढ़। पुलिस विभाग से एक बेहद दुखद और हृदय विदारक खबर सामने आई है। 2008 बैच के जांबाज और कर्तव्यनिष्ठ 44 वर्षीय पुलिस निरीक्षक अमित शुक्ला अब हमारे बीच नहीं रहे। ब्रेन कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से लंबे समय तक पूरी बहादुरी से लडऩे के बाद, आखिरकार नियति के आगे वह जिंदगी की जंग हार गए। रायपुर के एक निजी अस्पताल में इलाज के दौरान 17 मई (रविवार) की शाम करीब 6:30 बजे उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर से पूरे पुलिस महकमे सहित रायगढ़ और बिलासपुर में शोक की लहर दौड़ गई है। अमित शुक्ला जितने बेहतरीन पुलिस अफसर थे, उतने ही मजबूत इरादों वाले इंसान भी थे।
जब उन्हें 2023 के अंत में ब्रेन कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी का पता चला, तो उन्होंने घुटने टेकने के बजाय उसका डटकर मुकाबला किया। इलाज के दौरान मुंबई में उनकी दो बार बड़ी सर्जरी हुई। हर बार डॉक्टरों और करीबियों को लगता था कि अब उनका काम पर लौटना मुश्किल होगा, लेकिन अपनी अदम्य इच्छाशक्ति के बल पर वह न सिर्फ ठीक हुए, बल्कि दोबारा वर्दी पहनकर पूरी ऊर्जा के साथ ड्यूटी भी जॉइन की। उनका यह जज्बा पूरे महकमे के लिए एक मिसाल था। बीमारी के दोबारा उभरने के बाद दिसंबर 2025 से वे रायपुर के एक निजी अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहे थे। हर कोई उनके जल्द स्वस्थ होने की दुआ कर रहा था, लेकिन रविवार की शाम को आई इस मनहूस खबर ने सबको स्तब्ध कर दिया।
दिल के साफ और जुबान के खरे थे अमित
अमित शुक्ला की गिनती छत्तीसगढ़ पुलिस के पढ़े-लिखे और काबिल अफसरों में होती थी। पुलिस सेवा में आने से पहले उन्होंने एमबीए की उच्च शिक्षा हासिल की थी, लेकिन खाकी के प्रति उनका जुनून उन्हें रायपुर के चंदखुरी (पुलिस अकादमी) ले आया, जहां से उनकी ट्रेनिंग पूरी हुई। अमित शुक्ला बेहद साफ दिल के इंसान थे, जो कभी किसी के साथ छल-कपट नहीं रखते थे। हालांकि, जो बात गलत होती, उस पर वे सामने वाले के मुंह पर बेबाकी से बोलने में भी नहीं कतराते थे। उनकी इसी बेबाकी और ईमानदारी के कारण मातहत और आला अफसर, दोनों ही उनका बेहद सम्मान करते थे।
रायगढ़ से रहा गहरा नाता: चक्रधर नगर ही पहला और अन्तिम थाना
अमित शुक्ला के पुलिस करियर का एक बड़ा और स्वर्णिम हिस्सा रायगढ़ जिले में बीता। वे करीब 8 साल तक रायगढ़ में विभिन्न पदों पर तैनात रहे। एक अद्भुत संयोग यह भी रहा कि रायगढ़ जिला पुलिस में कदम रखते ही उन्हें जो पहला थाना मिला, वह चक्रधर नगर था और अपनी सेवा के अंतिम पड़ाव में भी वे इसी चक्रधर नगर थाने के प्रभारी रहे। रायगढ़ की जनता और यहां के चप्पे-चप्पे से उनका एक आत्मीय जुड़ाव हो गया था।
पीछे रोता-बिलखता छोड़ गए मासूम परिवार
मूल रूप से बेमेतरा जिले के रहने वाले अमित शुक्ला का परिवार फिलहाल बिलासपुर में निवास करता है। उनके असमय चले जाने से परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है। उनके पीछे उनकी पत्नी और दो अत्यंत मासूम बेटियां हैं, जिनकी उम्र महज 7 साल और 10 साल है। पिता के साये से महरूम हुईं इन बच्चियों और बिलखते परिवार को देख हर किसी की आंखें नम हैं।
खाकी के यारों का छलका दर्द, ‘अमित तुम इतनी जल्दी क्यों चले गए…’
नियति का क्रूर प्रहार जब होता है, तो केवल एक परिवार नहीं उजड़ता, बल्कि यादों का वो पूरा कारवां बिखर जाता है जिसे सालों-साल सींचा गया हो। पुलिस अकादमी चंदखुरी में जब साल 2008 में खाकी पहनने का सपना लिए युवाओं का काफिला पहुंचा था, तब किसी ने नहीं सोचा था कि कंधों पर सितारे सजाने वाली ‘टोली नंबर 8’ का एक जांबाज साथी इतनी जल्दी इस सफर को बीच में ही छोड़ जाएगा। ब्रेन कैंसर से लंबी और बहादुरी भरी जंग लडऩे वाले निरीक्षक अमित शुक्ला के असमय निधन ने जहां पुलिस महकमे को स्तब्ध किया है, वहीं उनके बैच और विशेष रूप से उनकी ट्रेनिंग के दिनों के सबसे अजीज दोस्तों को गहरे सदमे में डाल दिया है।
ट्रेनिंग के वो दिन, जब कडक़ड़ाती धूप में पसीना बहाने के बाद खोली नंबर 8 में थके-हारे कदम ठहरते थे, तब अमित शुक्ला की बेबाकी और खिलखिलाहट पूरे कमरे की थकान मिटा दिया करती थी। आज उस खोली और उस टोली के उनके साथी – निरीक्षक अभिनवकांत सिंह, युवराज तिवारी, गगन बाजपेयी, रूपक शर्मा, विनय सिंह बघेल, दामोदर मिश्रा, संत राम सोनी और प्रशांत राव आहेर गहरे सन्नाटे और अंतहीन गम में डूबे हुए हैं। निरीक्षक अभिनवकांत सिंह बताते हैं कि कल तक जो दोस्त एक साथ मिलकर प्रदेश की सुरक्षा का जिम्मा संभाल रहे थे और आज छत्तीसगढ़ पुलिस के अव्वल दर्जे के कप्तानों (निरीक्षकों) में गिने जाते हैं, वे आज अपने भाई जैसे यार के जाने से भीतर तक टूट चुके हैं। वर्दी के सख्त मिजाज के पीछे छुपा दोस्तों का दिल आज चीख-चीख कर रो रहा है।
यादों में जिंदा रहेगी वो बेबाकी और हौसला
रुहांसे भरे निरीक्षक युवराज तिवारी बताते हैं कि अमित शुक्ला केवल एक अफसर नहीं थे, वे अपने दोस्तों के लिए एक हौसला थे। जब मुंबई में उनकी दो बार मेजर सर्जरी हुई, तब भी उनके चेहरे की शिकन और ‘खरी-खरी’ बोलने का वो चिरपरिचित अंदाज गायब नहीं हुआ था। अस्पताल के बिस्तर से उठकर जब वे दोबारा ड्यूटी पर लौटे, तो दोस्तों का सीना गर्व से चौड़ा हो गया था। हमें यकीन था कि उनका यार मौत को मात देकर लौट आया है लेकिन 17 मई की शाम 6:30 बजे जैसे ही रायपुर के अस्पताल से उनके अंतिम सांस लेने की खबर आई, खाकी के इन यारों के सब्र का बांध टूट गया।























