- धरमजयगढ़ में शरणार्थियों की जमीनें हड़पने वाले पर कार्रवाई जल्द, एसडीएम ने सौंपी रिपोर्ट
रायगढ़। धरमजयगढ़ में बंगाली शरणाथियों को आवंटित जमीनों को कूटरचना कर अपने नाम कराने वाला मामला बेहद गंभीर है। एसडीएम ने जांच करके रिपोर्ट दे दी है। कलेक्टर के आदेश पर आगे कार्रवाई होनी है। इस मामले में दंडात्मक कार्रवाई के बजाय रिकॉर्ड दुरुस्ती वाली करने की तैयारी है। सबसे बड़ी दिक्कत अब बैंकों को होने वाली है क्योंकि जिस जमीन पर लोन दिया गया, वह तो उसकी थी ही नहीं। रायगढ़ में जमीन घोटालों पर कार्रवाई समय पर नहीं होती इसलिए भूमाफिया आसानी से बच निकलते हैं। दागी अफसर और कर्मचारी भी रायगढ़ आकर बेलगाम हो जाते हैं।
धरमजयगढ़ में बांग्लादेशी विस्थापितों की जमीन हड़पने का मामला यह साबित करता है कि यदि रुपए फेंके जाएं, तो सरकारी जमीन भी किसी की निजी संपत्ति बन सकती है। धरमजयगढ़ में किसी को पांच तो किसी को सात एकड़ जमीन कृषि कार्य के लिए मिली थी। इस जमीन का डायवर्सन और उपयोग अन्य प्रयोजन के लिए नहीं किया जा सकता था। और न ही इसे बेचा जा सकता है। महादेव पिता मनींद्र बैरागी नामक व्यक्ति ने करीब 40 एकड़ शासकीय पट्टे की जमीन अपने और परिजनों के नाम कराई हैं। इन जमीनों पर लिए गए लोन सबसे बड़ी परेशानी बन गए हैं।
बैंकों ने सोचा भी नहीं था कि जिस जमीन को गिरवी रखकर लोन दिया जा रहा है, वह उसकी है ही नहीं। बग बैंकों को मुश्किल होने वाली है। महादेव ने बायसी में खनं 80/1/क/14 रकबा 1.809 हे., 80/1/क/25 रकबा 0.437 हे., 80/1/क/24 रकबा 0.304 हे., 80/1/क/8 रकबा 1.850 हे., 80/1/क/19 रकबा 0.304 हे., 80/1/क/18 रकबा 0.304 हे., 80/1/क/16 रकबा 1.173 हे., 80/1/क/21 रकबा 0.500 हे., 80/1/क/17 रकबा 1.850 हे. पर एक करोड़ से भी अधिक का लोन लिया है। यह जमीन महादेव, महावीर, विश्वजीत, पारुल, महानंद, सुजीत आदि के नाम पर हैं।
अब यह जमीन वापस होगी तो लोन का क्या होगा। बायसी कॉलोनी में खनं 85/1 रकबा 2.0230 हे. और 85/2 रकबा 0.8100 हे. महादेव के परिवार के नाम पर है। खनं 85/2 व्यावसायिक औद्योगिक प्रयोजन के लिए डायवर्टेड हो चुकी है। इसी तरह धरमजयगढ़ कॉलोनी में खनं 114/2 रकबा 0.809 हे. भी डायवर्टेड है। यह भी महादेव के नाम पर है।
कब होगी कार्रवाई
इस गड़बड़ी के सामने आने के बाद एसडीएम ने एक रिपोर्ट प्रस्तुत की थी। कलेक्टर ने पुख्ता रिपोर्ट बनाने का आदेश दिया। इसके बाद नए सिरे से रिपोर्ट बनाकर प्रस्तुत की गई है। सालों पहले आवंटित जमीनें अब महादेव, उसकी पत्नी पारुल और पुत्रों के नाम पर हैं। सवाल यह भी है कि क्या पति-पत्नी को अलग-अलग आवंटन हुआ। यदि नहीं हुआ तो कैसे उनके नाम दर्ज हैं। कहा जा रहा है कि तत्कालीन तहसीलदारों ने ही गलत तरीके से प्रकरण चलाकर जमीनें उसके नाम की हैं। दंडात्मक कार्रवाई हुई तो कई अधिकारी भी फंसेंगे।























