रायगढ़। भारत में जब भी किसी आपराधिक मामले में किसी व्यक्ति को गिरफ्तार किया जाता है, तो अक्सर समाचारों में ‘पुलिस हिरासत’ और ‘न्यायिक हिरासत’ जैसे भारी-भरकम शब्दों का प्रमुखता से उल्लेख सुनने को मिलता है। आम जनता के बीच अक्सर यह भ्रांति बनी रहती है कि ये दोनों व्यवस्थाएं एक ही हैं और दोनों का सीधा मतलब सिर्फ जेल जाना होता है। हालांकि, भारतीय कानून और हमारी न्यायिक प्रणाली में इन दोनों शब्दों का अर्थ, उद्देश्य और दायरा पूरी तरह से भिन्न है। बुनियादी तौर पर देखा जाए तो जहां एक ओर पुलिस हिरासत आरोपी को सीधे जांच अधिकारियों के नियंत्रण में सौंपती है, वहीं दूसरी ओर न्यायिक हिरासत उसे अदालत की प्रत्यक्ष निगरानी में सुरक्षित जेल भेज देती है।
पुलिस हिरासत (Police Custody)
इस कानूनी प्रक्रिया में सबसे पहले ‘पुलिस हिरासत’ की शुरुआत होती है, जिसे सामान्य बोलचाल में पुलिस कस्टडी कहा जाता है। जब पुलिस किसी व्यक्ति को किसी अपराध के संदेह या ठोस आरोप में गिरफ्तार करती है, तो उसे जांच के दायरे में रखते हुए संबंधित पुलिस स्टेशन के लॉक-अप में बंद किया जाता है। इस हिरासत का मुख्य और प्राथमिक उद्देश्य अपराध से जुड़े विभिन्न छिपे हुए पहलुओं की गहन जांच करना, सबूत जुटाना और आरोपी से आमने-सामने बैठकर पूछताछ करना होता है। भारतीय कानून के तहत आरोपी के अधिकारों की सुरक्षा के लिए कड़े प्रावधान किए गए हैं, जिसके अनुसार गिरफ्तार किए गए किसी भी व्यक्ति को 24 घंटे के भीतर नजदीकी मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना अनिवार्य होता है।
रिमांड का नया कानून
यदि पुलिस को लगता है कि मामले की तह तक जाने के लिए आरोपी से और अधिक पूछताछ जरूरी है, तो वे मजिस्ट्रेट से रिमांड की मांग करते हैं। देश में नए आपराधिक कानूनों के लागू होने के बाद, अब यह पूरी प्रक्रिया ‘भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता’ (BNSS), 2023 की धारा 187 (जो पूर्व में CrPC की धारा 167 थी) के तहत संचालित होती है। इन अद्यतन कानूनी प्रावधानों के तहत, अदालत पहली पेशी के बाद मामले की जरूरत के अनुसार पुलिस हिरासत (आमतौर पर अधिकतम 15 दिनों तक) मंजूर कर सकती है। इस रिमांड अवधि के दौरान जांच कर रहे पुलिस अधिकारियों के पास आरोपी तक सीधी, तात्कालिक और निरंतर पहुंच होती है।
न्यायिक हिरासत
इसके विपरीत, ‘न्यायिक हिरासत’ यानी ज्यूडिशियल कस्टडी एक ऐसी कानूनी व्यवस्था है जो आरोपी को पुलिस के सीधे प्रभाव और नियंत्रण से पूरी तरह बाहर कर देती है। जब मजिस्ट्रेट को यह प्रतीत होता है कि आरोपी को कानूनन हिरासत में रखना तो आवश्यक है, लेकिन अब उससे पुलिस द्वारा और अधिक पूछताछ की कोई तात्कालिक जरूरत नहीं बची है, तब अदालत उसे न्यायिक हिरासत में भेजने का आदेश जारी करती है। इस स्थिति में आरोपी को पुलिस स्टेशन के लॉक-अप के बजाय सीधे केंद्रीय या जिला जेल (कारागार) भेज दिया जाता है। यहाँ आरोपी की सुरक्षा और निगरानी की पूरी जिम्मेदारी जेल प्रशासन तथा संबंधित अदालत की होती है।
पूछताछ के सख्त नियम और हिरासत की अधिकतम अवधि
न्यायिक हिरासत की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इस दौरान पुलिस अपनी मर्जी से आरोपी से सीधे पूछताछ नहीं कर सकती। यदि जांच के सिलसिले में पुलिस को दोबारा सवाल-जवाब करने की कोई अनिवार्य आवश्यकता महसूस होती है, तो उसे इसके लिए अदालत से विशेष अनुमति प्राप्त करनी होती है। इसके अलावा, दोनों की समय-सीमा में भी बड़ा अंतर है। गंभीर अपराधों के मामलों में न्यायिक हिरासत को अधिकतम 90 दिनों तक बढ़ाया जा सकता है, जबकि कम गंभीर मामलों में यह अवधि 60 दिनों तक की हो सकती है।
न्याय प्रणाली में दोनों का संतुलित महत्व
इन दोनों के मुख्य अंतर को यदि सरल शब्दों में समझा जाए, तो पुलिस हिरासत मुख्य रूप से जांच को गति देने और सच सामने लाने के लिए दी जाती है। वहीं दूसरी ओर, न्यायिक हिरासत का मुख्य उद्देश्य मुकदमे या जांच के दौरान आरोपी को अदालत के संरक्षण में सुरक्षित रखना होता है ताकि वह बाहर रहकर गवाहों को डरा न सके या सबूतों के साथ किसी प्रकार की छेड़छाड़ न कर सके। इस प्रकार, कानून की ये दोनों कड़ियां न्याय प्रणाली को निष्पक्ष, संतुलित और मानवाधिकारों के अनुकूल बनाए रखने में अपनी अलग-अलग लेकिन बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।






















