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रायगढ़ में 19 लाख अनुपयोगी बारदाने के लिए 5 साल में 50 लाख खर्च, फिजूलखर्ची में नंबर वन पर है मार्कफेड

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  • किराए के गोदामों और सुरक्षा पर कर रहे व्यय

रायगढ़। जो बारदाने किसी काम के नहीं है, उनको रखने के लिए मार्कफेड हर साल दस लाख रुपए खर्च कर रहा है। रायगढ़ जिले में करीब 19 लाख अनुपयोगी बारदानों के पीछे पांच साल में करीब 50 लाख व्यय हो चुके हैं। प्रारंभ से अब तक की गणना करें तो केवल रायगढ़ जिले का खर्च एक करोड़ से अधिक होगा। प्रतिवर्ष धान खरीदी के दौरान बारदानों की आपूर्ति होती है। कई गठान बारदाने अमानक भी हो जाते हैं और अनुपयोगी भी। मार्कफेड के नियम बड़े अजीब हैं। अनुपयोगी बारदानों की गिनती तो पूरी है लेकिन इनका निराकरण नहीं किया जा रहा है। कई बार नीलामी का प्रयास किया गया लेकिन कोई खरीदने ही नहीं आया। रायगढ़ जिले में कुल 19,00,001 अनुपयोगी बारदाने हैं। ये बारदाने किराए के गोदामों में भंडारित हैं। इनकी कीमत प्रति बारदाना एक रुपए आंकी गई है। रायगढ़ जिले में इन 19 लाख बारदानों को रखने के लिए वर्ष 20-21 से अब तक 48,98,552 रुपए खर्च किए जा चुके हैं।

दिलचस्प बात यह है कि जिन बारदानों का भविष्य में कोई उपयोग ही नहीं किया जा सकता, उसके लिए लाखों रुपए फूंके जा चुके हैं। अब ये बारदाने मार्कफेड की गले की फांस बन गए हैं। यह बारदाने सडक़र कचरा बन चुके हैं, लेकिन कोई इनका निराकरण नहीं कर पा रहा है। यह पांच साल पहले से भंडारित हैं, ऐसा नहीं है। करीब 2012 से यह बारदाने रखे गए हैं। तब से अब तक गणना करें, तो एक करोड़ से भी ज्यादा राशि खर्च की जा चुकी है। प्रदेश में करीब 16 जिलों में ऐसे बारदाने रखे हुए हैं। इन पांच सालों में सड़े-गले बारदानों पर मार्कफेड सात करोड़ रुपए खर्च कर चुका है। इसका भुगतान करने में अधिकारी देर नहीं लगाते। एसडब्ल्यूसी और दूसरे निजी गोदाम मालिकों को हर साल बिना रुके भुगतान किया जा रहा है। नीलामी करने का प्रयास किया गया था लेकिन कोई खरीदार ही नहीं आया।

वित्त विभाग को मालूम ही नहीं

मितव्ययिता के बजाय सरकार मनमाने तरीके से खर्च कर रही है। सोचिए कि मार्कफेड बिना कुछ सोचे-समझे करोड़ों रुपए ऐसे बारदानों पर खर्च कर चुका है जिनकी गिनती भी नहीं हो सकती। दस साल से भी ज्यादा समय से बारदाने बेकार पड़े हुए हैं। इनका कहीं भी उपयोग नहीं हो सकता। विपणन संघ से संबंधित होने के कारण वित्त विभाग को इसका पता भी नहीं चलता। व्यर्थ में बहाए जा रहे करोड़ों रुपए के लिए वित्त विभाग की अनुमति लेने की जरूरत भी नहीं पड़ती।

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Editorial

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