रायगढ़ (केलो प्रवाह)। सरकार ने आदिवासी भूमि को गैर-आदिवासियों के अप्रत्यक्ष नियंत्रण में जाने से रोकने के लिए सख्त आदेश दिया है। गैर-आदिवासियों द्वारा आदिवासी भूमि को विधिवत अपने नाम पर खरीदने के बजाय नौकर, परिचित, रिश्तेदार अथवा अन्य व्यक्ति के नाम पर पंजीयन कराने और बाद में भूमि पर वास्तविक कब्जा लेने मामलों की जांच के निर्देश दिए हैं। उपरोक्त तीन मामले ऐसे ही हैं। रायगढ़ में ऐसे दो-चार नहीं, सैकड़ों केस हैं। पूर्व में बेनामी अंतरण के प्रकरण भी दर्ज थे लेकिन किसी में कोई कार्रवाई नहीं हुई।
राजस्व विभाग ने सभी कलेक्टरों को आदेश दिया है कि वे संदिग्ध मामलों में भूमि के आगे के हस्तांतरण पर नियमानुसार रोक लगाने तथा कानून के विपरीत पाए जाने वाले पुराने मामलों में भूमि को पुन: आदिवासी खातेदार के पक्ष में बहाल करने की कार्रवाई का प्रावधान का पालन करें। छत्तीसगढ़ राज्य अनुसूचित जनजाति आयोग ने शासन को पत्र भेजकर आदिवासी भूमि के संरक्षण की दिशा में कार्रवाई का सुझाव दिया था। कई स्थानों पर आदिवासी भूमि के प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष हस्तांतरण की शिकायतें सामने आती रही हैं।
आदिवासी भूमि के प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष हस्तांतरण की जांच कराने तथा ऐसे मामलों की पड़ताल करने को कहा गया, जहां जमीन आदिवासी से किसी नौकर, परिचित, रिश्तेदार अथवा अन्य व्यक्ति के नाम पर खरीदी गई हो, लेकिन उसका वास्तविक उपयोग या आर्थिक लाभ किसी गैर-आदिवासी द्वारा लिया जा रहा हो। संदेहास्पद एवं नियम-विरुद्ध पंजीयन व नामांतरण की जांच पूरी होने तक संबंधित भूमि के आगे के हस्तांतरण पर नियमानुसार रोक लगाने की कार्रवाई की जाए।
केस-1
धरमजयगढ़ अनुविभाग के छाल तहसील के ग्राम चितापाली में नरेश कुमार पिता तुलाराम कंवर की भूमि खनं 53/2 रकबा 0.405 हे. थी। खेती किसानी करके जीवन-यापन कर चल रहा था। बाद में किसी प्राइवेट कंपनी ने रायगढ़ से बाहर के किसी व्यक्ति हेमसाय राम पिता छेरिका जाति कंवर निवासी पिडिय़ा मैनपाट के नाम पर इसकी रजिस्ट्री करवा ली। इसके बाद भू-अर्जन में जमीन प्रभावित हुई। लेकिन उद्योग नहीं लगा इसलिए अब भूमि महाप्रबंधक उद्योग विभाग के नाम पर है।
केस-2
पुसौर के ग्राम बासनपाली में आशाराम पिता विशम्भर जाति संवरा की जमीन खनं 112/8 रकबा 0.235 हे. स्थित थी। इस जमीन की बेनामी खरीदी की गई थी। अशोक कुमार पिता कन्हैयालाल निवासी बोरगांव तहसील केशकाल जिला बस्तर ने जमीन को क्रय किया। जांच में पता चला कि भूमि पर कोरबा वेस्ट पावर कंपनी बड़े भंडार का कब्जा था। जमीन हासिल करने के लिए बेनामी अंतरण किया गया। अब यह जमीन महाप्रबंधक उद्योग विभाग के नाम पर है।
केस-3
रायगढ़ तहसील के ग्राम बादपाली में केवरा पिता सुखरू जाति कंवर के भूमिस्वामी हक की जमीन खनं 18/1 रकबा 2.832 हे. स्थित है। यहां भी आदिवासी की जमीन का बेनामी अंतरण किया गया। राजेंद्र पिता मंगल निवासी राजगांगपुर, सुंदरगढ़ ने जमीन को खरीदा। यह प्रकरण बेनामी अंतरण के रूप पंजीबद्ध किया गया था। अब भी यह भूमि राजेंद्र के नाम पर ही है।
बेनामी अंतरण के 300 प्रकरण थे दर्ज
पूर्व में रायगढ़ जिले में आदिवासी भूमि के बेनामी अंतरण के करीब 300 मामले दर्ज थे। धरमजयगढ़, घरघोड़ा, लैलूंगा, तमनार, पुसौर, रायगढ़ और खरसिया में ऐसे प्रकरण एसडीएम कोर्ट में पंजीबद्ध थे। तब सरकार एक मामले में भी कार्रवाई का साहस नहीं दिखा सकी। कुनकुनी घोटाला, 170 ख के प्रकरण, गोदावरी पावर, कोरबा वेस्ट आदि इसके उदाहरण हैं। नए आदेश का उद्देश्य केवल भविष्य में होने वाले संदिग्ध लेन-देन को रोकना ही नहीं, बल्कि पूर्व में हुए ऐसे मामलों की भी जांच करना है। यदि कोई सौदा कानून के विपरीत पाया जाता है, तो संबंधित भूमि को नियम अनुसार पुन: आदिवासी खातेदार के पक्ष में बहाल करने की कार्रवाई की जानी है।






















