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बंजर जमीन ने बदल दी तकदीर: कभी दो वक्त की रोटी के लिए जूझते थे इस गांव के किसान, आज ‘नाशपाती’ बेचकर खरीद रहे ट्रैक्टर और पिकअप

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बलरामपुर। अगर कोई आपसे कहे कि जिस पथरीली और बंजर जमीन पर कभी खेती करना घाटे का सौदा माना जाता था, आज उसी जमीन से किसान सालाना लाखों रुपये की कमाई कर रहे हैं और अपनी मेहनत की कमाई से ट्रैक्टर व पिकअप खरीद रहे हैं, तो शायद यकीन करना आसान नहीं होगा। लेकिन छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिले का शंकरगढ़ विकासखंड आज इसी बदलाव की जीती-जागती मिसाल बन चुका है। यहां नाशपाती की खेती ने केवल खेतों की तस्वीर नहीं बदली, बल्कि हजार से ज्यादा किसान परिवारों के जीवन में नई उम्मीद, नई आय और नई पहचान भी जोड़ दी है। शंकरगढ़ के देवसारा, लारंगी, भगवतपुर, भुवनेश्वरपुर और जारहाडीह जैसे गांवों में इन दिनों नाशपाती की तुड़ाई पूरे शबाब पर है।

जहां कभी पथरीली जमीन और कम उत्पादन किसानों की सबसे बड़ी चिंता हुआ करती थी, वहीं आज दूर-दूर तक फैले करीब एक हजार एकड़ के आम और नाशपाती के बगीचे इस बात की गवाही दे रहे हैं कि खेती में सही योजना और धैर्य कितना बड़ा बदलाव ला सकते हैं। फलों से लदे पेड़ और बगीचों में जुटे किसान इस इलाके की बदलती तस्वीर खुद बयां कर रहे हैं। हालांकि यह सफलता अचानक नहीं मिली। इसके पीछे करीब एक दशक की मेहनत, इंतजार और भरोसे की कहानी छिपी है। इसकी शुरुआत वर्ष 2013-14 में हुई, जब रूरल एजुकेशन एंड डेवलपमेंट सोसाइटी ने नाबार्ड के सहयोग से वाड़ी विकास कार्यक्रम के तहत किसानों को फलदार पौधों की खेती अपनाने के लिए प्रेरित किया।

शुरुआत में कई किसान संशय में थे। फलदार पौधों से आय मिलने में वर्षों लगने थे और छोटे किसानों के लिए यह फैसला किसी बड़े जोखिम से कम नहीं था। इसके बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और बंजर जमीन में भविष्य की उम्मीद बो दी।किसानों का भरोसा तब और मजबूत हुआ, जब वर्ष 2018-19 में पहली बार बगीचों से अच्छी पैदावार मिलने लगी। इसके बाद शंकरगढ़ में नाशपाती की खेती लगातार बढ़ती गई और देखते ही देखते यह इलाका प्रदेश के प्रमुख नाशपाती उत्पादक क्षेत्रों में गिना जाने लगा। हर सीजन के साथ उत्पादन बढ़ा, बाजार बढ़ा और किसानों की आय भी बढ़ती चली गई।

शंकरगढ़ के किसानों की सफलता की एक और बड़ी वजह उनकी बदली हुई खेती की सोच है। वे अब केवल फल उत्पादन तक सीमित नहीं हैं। आम और नाशपाती के पेड़ों के बीच खाली बची जमीन में दूसरी फसलें लेकर अतिरिक्त आमदनी भी कर रहे हैं। इससे पूरे साल आय का स्रोत बना रहता है और खेती की लागत निकालने के साथ परिवार की आर्थिक जरूरतें भी आसानी से पूरी हो जाती हैं। यही मॉडल अब दूसरे किसानों के लिए भी प्रेरणा बन रहा है। आज स्थिति यह है कि प्रति एकड़ आम और नाशपाती के बगीचों से किसानों को 50 हजार से लेकर 1 लाख रुपये तक की शुद्ध सालाना आमदनी हो रही है। यही वजह है कि जिन परिवारों के लिए कभी खेती सिर्फ गुजारे का साधन थी, वे अब आधुनिक कृषि उपकरण, ट्रैक्टर और पिकअप खरीदकर खेती को नए स्तर पर ले जा रहे हैं।

गांवों में यह बदलाव केवल खेतों तक सीमित नहीं है, बल्कि लोगों के जीवन स्तर में भी साफ दिखाई देने लगा है। शंकरगढ़ की यह कहानी सिर्फ नाशपाती की खेती की सफलता नहीं है, बल्कि यह इस बात का उदाहरण भी है कि सही मार्गदर्शन, संस्थागत सहयोग और किसानों की मेहनत मिल जाए तो पथरीली और बंजर मानी जाने वाली जमीन भी खुशहाली की नई इबारत लिख सकती है। आज शंकरगढ़ केवल बलरामपुर की पहचान नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ में बदलती खेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का एक सफल मॉडल बनकर उभर रहा है।

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