न्यूज डेस्क। खेल के मैदान से निकलकर सत्ता के गलियारों तक पहुंचने का सफर आसान नहीं होता, लेकिन टीम इंडिया के एक पूर्व स्टार ने यह साबित कर दिया है कि उनकी ‘बाउंसर’ का जवाब फिलहाल विपक्षियों के पास नहीं है। पश्चिम बंगाल की राजनीति में इस वक्त एक ही नाम की गूंज सबसे ज्यादा सुनाई दे रही है और वह नाम है पूर्व भारतीय तेज गेंदबाज अशोक डिंडा का। पूर्वी मिदनापुर की मोयना विधानसभा सीट पर हुए कड़े मुकाबले में डिंडा ने एक बार फिर अपना परचम लहराया है। भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर चुनावी समर में उतरे डिंडा ने तृणमूल कांग्रेस (TMC) के उम्मीदवार
चंदन मंडल को शिकस्त देकर यह साफ कर दिया है कि उनकी लोकप्रियता केवल क्रिकेट पिच तक सीमित नहीं है। ताजा आंकड़ों के मुताबिक अशोक डिंडा ने लगभग 15 हजार वोटों के बड़े अंतर से जीत दर्ज की है। यह जीत इसलिए भी खास है क्योंकि डिंडा ने लगातार दूसरी बार इसी सीट से विधायक बनकर अपनी राजनीतिक जड़ों की मजबूती का अहसास कराया है। इससे पहले उन्होंने टीएमसी के कद्दावर नेता संग्राम कुमार दोलाई को मात देकर राजनीतिक जगत में सनसनी फैला दी थी।
क्रिकेट के गलियारों से विधानसभा की दहलीज तक
25 मार्च 1984 को बंगाल की मिट्टी में जन्मे अशोक डिंडा का अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट करियर साल 2009 में श्रीलंका के खिलाफ शुरू हुआ था। भले ही टीम इंडिया के लिए उन्होंने 13 वनडे और 9 टी-20 मैच खेले हों, लेकिन घरेलू क्रिकेट में उनका कद किसी दिग्गज से कम नहीं रहा। प्रथम श्रेणी क्रिकेट में 400 से अधिक विकेट लेना उनकी धारदार गेंदबाजी का प्रमाण है। आईपीएल में भी उन्होंने कोलकाता नाइट राइडर्स और रॉयल चैलेंजर्स बैंगलोर जैसी बड़ी टीमों के लिए अपना पसीना बहाया है।
बीजेपी का वो ट्रंप कार्ड जिसने पलटा गेम
अशोक डिंडा को राजनीति में लाना बीजेपी की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा माना जाता रहा है। बंगाल की जनता के बीच उनकी छवि एक जुझारू खिलाड़ी की है, जिसका सीधा फायदा चुनाव परिणामों में देखने को मिला। मोयना की जनता ने डिंडा की कार्यशैली पर दोबारा मुहर लगाकर यह संदेश दिया है कि वे एक ‘पार्ट-टाइम पॉलिटिशियन’ नहीं बल्कि जमीन से जुड़े जनसेवक बन चुके हैं।
हालांकि राज्य की सत्ता की अंतिम तस्वीर साफ होने में अभी वक्त है, लेकिन डिंडा की इस व्यक्तिगत जीत ने चुनावी गलियारों में हलचल तेज कर दी है। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि खेल के अनुशासन को राजनीति में लागू करना ही डिंडा की सफलता का असली राज है।























