महासमुंद। छत्तीसगढ़ के कृषि परिदृश्य में इन दिनों एक बड़ी क्रांति देखी जा रही है। महासमुंद जिले के बागबाहरा विकासखंड के ग्राम कुल्हरिया की एक प्रगतिशील महिला किसान उमा शुक्ला ने पारंपरिक खेती की सीमाओं को तोड़कर एक नई मिसाल पेश की है। उन्होंने धान की खेती छोड़कर Dragon Fruit (कमलम) को अपनाया और महज एक एकड़ के रकबे से ₹1.25 लाख का शुद्ध मुनाफा कमाकर सबको हैरान कर दिया है। उमा शुक्ला की मेहनत की गूँज अब राजधानी रायपुर तक पहुँच गई है, जहाँ खुद प्रदेश के कृषि मंत्री रामविचार नेताम ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल्स पर इस मॉडल की सराहना की है।
जब कृषि मंत्री ने खुद शेयर की उमा की कहानी
अमूमन सरकार की योजनाओं की तारीफ अधिकारी करते हैं, लेकिन यहाँ मामला उल्टा है। प्रदेश के कृषि मंत्री रामविचार नेताम खुद उमा शुक्ला की मेहनत के कायल हो गए। उन्होंने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल्स पर “ड्रैगन फ्रूट से खेती में क्रांति – किसान उमा शुक्ला की सफलता की गाथा” लिखकर पोस्ट साझा किया है। कृषि मंत्री द्वारा साझा किए गए आंकड़ों के अनुसार, उमा शुक्ला को ड्रैगन फ्रूट की खेती से प्रति एकड़ 40 क्विंटल का बम्पर उत्पादन प्राप्त हो रहा है। मंत्री जी ने अपने आधिकारिक पेजों पर प्रमुखता से जिक्र किया है कि आधुनिक तकनीक और सरकारी योजनाओं के सही तालमेल से उमा जी अब ₹1.25 लाख की शुद्ध वार्षिक आय प्राप्त कर रही हैं। मंत्री जी की इस पोस्ट के बाद अब यह फार्मिंग मॉडल पूरे प्रदेश के किसानों के लिए ‘रोल मॉडल’ बन गया है।
धान में सिर्फ पसीना था, ड्रैगन फ्रूट में पैसा है
ग्राम कुल्हरिया की निवासी उमा शुक्ला और उनके पति प्रकाश नारायण शुक्ला के पास कुल 1.62 हेक्टेयर कृषि भूमि है। पहले वे अपनी पूरी जमीन पर पारंपरिक तरीके से केवल धान की पैदावार लेते थे। सिंचाई के पर्याप्त साधन होने के बावजूद, धान की खेती में मुनाफा बेहद सीमित था। उमा जी बताती हैं, “धान में प्रति एकड़ औसतन 15 से 18 क्विंटल उत्पादन होता था। लागत, मजदूरी और खाद-बीज के खर्च के बाद जो बचता था, वह परिवार की जरूरतों के लिए नाकाफी था। हमें समझ आ गया था कि अगर आर्थिक स्थिति बदलनी है, तो खेती का तरीका बदलना होगा।”
राष्ट्रीय बागवानी मिशन से बदली तकदीर
शुक्ला दंपति की किस्मत में बड़ा मोड़ तब आया जब उन्हें राष्ट्रीय बागवानी मिशन (National Horticulture Mission) के बारे में जानकारी मिली। उद्यानिकी विभाग के मार्गदर्शन में उन्होंने न केवल आधुनिक कृषि पद्धतियों को समझा, बल्कि ड्रैगन फ्रूट जैसी ‘नकदी फसल’ की बारीकियों को भी सीखा। सरकार द्वारा दी गई सब्सिडी और तकनीकी प्रशिक्षण ने उनके आत्मविश्वास को बढ़ाया। उन्होंने अपनी जमीन पर सीमेंट के खंभों के माध्यम से ड्रैगन फ्रूट के पौधे रोपे, जो छत्तीसगढ़ की गर्म जलवायु और कम पानी वाली परिस्थितियों के लिए पूरी तरह अनुकूल साबित हुए।
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मुनाफे का गणित: क्यों खास है यह खेती?
ड्रैगन फ्रूट की खेती न केवल आर्थिक रूप से लाभदायक है, बल्कि यह कम जोखिम वाली फसल भी है। उमा शुक्ला को स्थानीय मंडियों सहित बड़े शहरों में इस ‘सुपरफूड’ की जबरदस्त मांग के कारण 80 रुपये प्रति किलोग्राम का थोक भाव आसानी से मिला। जहाँ धान में लागत निकालने के बाद बहुत कम लाभ बचता था, वहीं ड्रैगन फ्रूट ने तमाम खर्च काटकर उन्हें ₹1,25,000 प्रति एकड़ का शुद्ध लाभ दिया। विशेषज्ञों के अनुसार, यह फसल एक बार लगाने पर 20 से 25 वर्षों तक फल देती है, जिससे किसानों को लंबे समय तक सुरक्षित आय सुनिश्चित होती है।
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बहरहाल आज कुल्हरिया गाँव सिर्फ एक गाँव नहीं, बल्कि प्रगतिशील खेती का एक स्कूल बन चुका है। उमा शुक्ला की यह ‘सक्सेस स्टोरी’ बताती है कि अगर किसान हिम्मत दिखाए और सरकारी योजनाओं का सही लाभ ले, तो मिट्टी से सोना उगाना नामुमकिन नहीं है।
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