रायगढ़ (केलो प्रवाह)। केलो परियोजना के तहत रूके हुए नहर निर्माण के कार्य में तेजी लाने प्रशासन ने किसानों के लंबित मुआवजा प्रकरणों के शीघ्र निराकरण के लिए पहल की है। शुक्रवार को प्रभावित किसानों को बुलाकर त्रिपक्षीय वार्ता की गई। बैठक में किसानों से दावा आपत्तियां ली गईं हैं। हालांकि कुछ किसानों के दस्तावेजों की कमी होने के कारण मुआवजा नहीं दिया जा सका है जिसमें आ रही समस्याओं का निराकरण करने की बात कही गई है, परंतु जो किसान वर्तमान दर से मुआवजा राशि देने की मांग कर रहे हैं उन्हें संतुष्ट करना प्रशासन के लिए टेढ़ी खीर साबित हो रहा है।
दरअसल, 11 साल पुरानी केलो परियोजना के नहर निर्माण के लिए भूमि अधिग्रहण से प्रभावित 1236 किसानों को अब तक पूरा मुआवजा नहीं मिल पाया है। कहीं भू-अर्जन की प्रक्रिया में अड़चन है, तो कहीं मुआवजे की दरों को लेकर विवाद की स्थिति निर्मित होने के कारण मुआवजा के प्रकरण लंबित है। लंबे समय से परियोजना प्रभावित किसान मुआवजे के लिए दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं। वहीं नेतनागर सहित कुछ गांव से नहर गुजरेगी लेकिन उक्त गावों में नहर से सिंचाई के लिए पानी नहीं दिया जायेगा। ऐसे में किसान जमीन देने को तैयार नहीं है। यह वजह है कि नहर का काम अधर में लटका हुआ है।
वहीं काम में लेट लतीफी होने के कारण योजना की लागत में भी वृद्धि हो रही है। यही वजह है कि जिला प्रशासन की ओर से प्रभावित किसानों से बातचीत कर समस्या का हल निकालने की पहल करते हुए शुक्रवार को त्रिपक्षीय वार्ता रखी थी। केलो परियोजना के कार्यपालन अभियंता मनीष गुप्ता व राजस्व विभाग के अधिकारियों तथा किसानों के समक्ष बैठक हुई। बैठक में किसानों ने अपनी समस्या रखी जिसमें कुछ किसानों के जमीन का बंटवारा को लेकर विवाद है तो कुछ किसानों का कहना है कि उनकी सिंचित भूमि है और दो फसली है लेकिन पटवारी ने एक ही फसल का उल्लेख कर दिया है, जिससे मुआवजा कम दिया जा रहा है।
ऐसे विवादों पर अधिकारियों ने आपसी सामजंस्य बैठा कर समस्या का निराकरण कराने के लिए उन्हें आश्वस्त किया गया है। वहीं दूसरी ओर कुछ किसान नहर से पानी नहीं मिलने के कारण अपनी जमीन देना नहीं चाह रहे है तथा पूर्व में की गई अधिग्रहण की कार्रवाई के अनुसार मुआवजा नहीं बल्कि वर्तमान दर से मुआवजा देने की मांग कर रहे हैं। ऐसे किसानों के साथ सहमति बनाने में अधिकारियों के पसीने छूट रहे हैं। कुल मिला कर यह कहें कि त्रिपक्षीय वार्ता के बाद भी कुछ हल नहीं निकल पाया है तो यह कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी।























