एक पत्नी और कई पति: क्या है इस परंपरा का सच?
भैंसों को क्यों मानते हैं अपना भगवान?
केलो प्रवाह डेस्क। भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र होने के साथ-साथ विविधताओं का भी देश है। यहाँ हर सौ किलोमीटर पर न सिर्फ पानी और बोली (बानी) बदल जाती है, बल्कि कई बार ऐसी परंपराएं भी देखने को मिलती हैं, जिन पर यकीन करना मुश्किल हो जाता है। हमारे देश में अनगिनत जाति और जनजाति समुदाय हैं, जिनमें हर एक की अपनी अलग कहानी है। लेकिन आज हम आपको दक्षिण भारत की नीलगिरी पहाड़ियों के बीच बसी ‘टोडा जनजाति’ (Toda Tribe) की उस रहस्यमयी दुनिया में ले जा रहे हैं, जहाँ कभी एक ही महिला से घर के सभी भाइयों की शादी कर दी जाती थी।आज भी भैंसों को भगवान की तरह पूजने वाले टोडा जनजाति के नियम और रहन-सहन आधुनिक समाज को हैरत में डाल देते हैं। क्यों है ना इंटरेस्टिंग? तो चलिए, विस्तार से जानते हैं इनके बारे में…
भैंस की पूंछ से हुआ था पहले इंसान का जन्म!
टोडा समुदाय अपनी एक अलग ही ‘टोडा भाषा’ बोलता है। इस जनजाति की उत्पत्ति की कहानी किसी साइंस फिक्शन फिल्म जैसी है। इनकी मान्यता है कि इनके प्रमुख देवता ‘ओन’ ने पाताल से पवित्र भैंसों को धरती पर निकाला था। जब आखिरी भैंस बाहर आ रही थी, तो उसकी पूंछ पकड़कर पहले ‘टोडा पुरुष’ ने धरती पर कदम रखा। बाद में उसी पुरुष की पसली से पहली महिला का निर्माण हुआ। यही वजह है कि इस पूरे समुदाय के जीवन का केंद्र ‘भैंस’ है। यहाँ भैंसों का तबेला या दूध निकालने की जगह किसी भव्य मंदिर से कम पवित्र नहीं मानी जाती। दूध दुहने और मक्खन निकालने के लिए बाकायदा खास पुजारी होते हैं, जिन पर कई सख्त नियम लागू होते हैं (जैसे वे नदी पार करने के लिए पुल का इस्तेमाल नहीं कर सकते)।
‘आखिर क्यों एक औरत से शादी करते थे सारे भाई?
‘टोडा जनजाति‘ की सबसे चर्चित और अजीबोगरीब परंपरा उनकी विवाह पद्धति रही है। ऐतिहासिक रूप से यहाँ ‘बहुपति प्रथा’ (Polyandry) का कड़ाई से पालन होता था। इसका मतलब था कि अगर एक भाई की शादी किसी महिला से होती है, तो घर के बाकी सभी भाई भी अपने आप उस महिला के पति मान लिए जाते थे। सुनने में यह भले ही अजीब लगे, लेकिन नीलगिरी की कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में यह उनके सर्वाइवल (जीवित रहने) की सबसे अचूक रणनीति थी: जब महिला गर्भवती होती थी, तो होने वाले बच्चे का ‘सामाजिक पिता’ कौन होगा, यह तय करने के लिए एक खास रस्म होती थी, जिसमें महिला को लकड़ी का धनुष-बाण भेंट किया जाता था।
- संपत्ति को बंटने से रोकना: टोडा समुदाय में भैंस और ज़मीन ही असली संपत्ति है। अगर हर भाई अलग शादी करता, तो ज़मीन और भैंसों का बंटवारा हो जाता और परिवार गरीब हो जाता।
- पारिवारिक कलह से मुक्ति: एक ही पत्नी होने से भाइयों के बीच संपत्ति या ईर्ष्या को लेकर कोई विवाद नहीं होता था।
- सामूहिक जिम्मेदारी: इस प्रथा से परिवार एक मजबूत यूनिट की तरह काम करता था और बच्चों की परवरिश भी सामूहिक रूप से बेहतर तरीके से होती थी।
(हालांकि, आधुनिक शिक्षा और बाहरी दुनिया के संपर्क में आने के बाद अब टोडा समाज में यह प्रथा लगभग खत्म होने की कगार पर है।)
बिना खिड़की वाले घर, जिनमें जाना पड़ता है रेंगकर
इनके रहने के तरीके भी कम दिलचस्प नहीं हैं। टोडा बस्तियों को ‘मंड’ कहा जाता है। यहाँ बांस और सूखी घास से बनी आधी गोल (ढोल या बैरल के आकार की) झोपड़ियां होती हैं, जिन्हें ‘डोगल्स’ कहते हैं। इन घरों का दरवाज़ा जानबूझकर इतना छोटा बनाया जाता है कि एक इंसान को भी अंदर रेंगकर ही जाना पड़ता है। ऐसा सदियों से जंगली जानवरों के हमलों से बचने के लिए किया जाता रहा है।
शाकाहारी है यह समुदाय
जंगलों में रहने के बावजूद टोडा लोग पारंपरिक रूप से पूरी तरह शाकाहारी होते हैं। इनका मुख्य भोजन चावल है, जिसे ये भैंस के ताज़े दूध, दही और शुद्ध मक्खन के साथ बड़े चाव से खाते हैं। आज टोडा जनजाति का पूरा इलाका नीलगिरी बायोस्फीयर रिज़र्व के अंतर्गत आता है और यूनेस्को (UNESCO) ने इसे विश्व धरोहर का दर्जा दे रखा है।
हमें उम्मीद है कि हमारे पाठकों को ‘टोडा जनजाति‘ के बारे में यह जानकारी आपको पसंद आई होगी।”


























