- आवंटित भूमि को बिना अनुमति कराई थी रजिस्ट्री, एक भूमि शासन में निहित बाकी नहीं क्यों
रायगढ़। धरमजयगढ़ में बांग्लादेशी विस्थापितों को आवंटित जमीनों के मालिक बदल गए और प्रशासन को पता तक नहीं चला। कैसे सैकड़ों एकड़ जमीन पहले बंगालियों के नाम हुई और अब इस पर दूसरे नाम चढ़ गए हैं। जबकि आवंटित जमीन की खरीदी-बिक्री भी बिना अनुमति नहीं हो सकती। इसमें एक और खुलासा हुआ है। वेदांता ग्रुप की कंपनी बाल्को ने संजय जैन नामक व्यक्ति के नाम से ऐसी ही आवंटित जमीनें खरीदी हैं। धरमजयगढ़ में महादेव बैरागी ने अपने परिजनों के नाम पर शासकीय पट्टे की कई जमीनों को दर्ज करवा लिया है। सवाल यह है कि बिना रजिस्ट्री, बिना किसी राजस्व प्रकरण के विस्थापितों को आवंटित भूमि उसके नाम पर कैसे हुई।
इस सनसनीखेज प्रकरण ने धरमजयगढ़ में हुई अंधेरगर्दी को सतह पर ला दिया है। अब वेदांता ग्रुप की कंपनी बाल्को का भी मामला सामने आ चुका है। कंपनी के ऐसे चार प्रकरण सामने आ चुके हैं। एक में तो कलेक्टर कोर्ट में सुनवाई भी हुई और भूमि वापस शासन के खाते में दर्ज कर ली गई। बाकी तीन खसरों में जमीन पर अभी भी बाल्को के संजय जैन का ही नाम है। धरमजयगढ़ के बायसी कॉलोनी में मूल खसरा नंबर 80 शासकीय भूमि है। करीब 1000 एकड़ जमीन इस खसरे में रही होगी। कालांतर में आवंटन और रिकॉर्ड दुरुस्त होते-होते यह कई टुकड़ों में बंट गई।
इसमें से बंगाली शरणार्थियों को जमीनें देकर बसाया गया था। पूर्व में वेदांता ग्रुप की कंपनी बाल्को को धरमजयगढ़ की दुर्गापुर 2 तराईमार कोल ब्लॉक आवंटित हुआ था। कंपनी ने अपने कर्मचारियों के नाम पर कई एकड़ जमीनें खरीदीं। इसमें से एक शासकीय पट्टे से प्राप्त भूमि 80/1/क/12 रकबा 1.943 हे. को 2010 के आसपास रजिस्ट्री करवा ली गई। यह भूमि परमानंद आत्मज राजेन्द्र नाथ निवासी को दी गई थी। बाल्को के अफसरों ने कहा कि कंपनी को कोल ब्लॉक लीज स्वीकृत हो गई है इसलिए कलेक्टर की अनुमति नहीं लगेगी। संजय जैन पिता प्रकाश जैन के नाम पर रजिस्ट्री करने के लिए पटवारी और तहसीलदार ने बिक्री नकल दे दी।
इस आधार पर रजिस्ट्री हो गई, लेकिन कोल ब्लॉक आवंटन निरस्त होने के बाद बाल्को का प्रोजेक्ट बंद हो गया। परमानंद ने जमीन वापस मांगी तो उसे कोर्ट जाने को कहा गया। तब कलेक्टर कोर्ट में प्रकरण चला। जांच में पता चला कि 1984 में परमानंद को पट्टा प्रदान किया गया था। 28 अप्रैल 2010 को संजय जैन के नाम पर रजिस्ट्री हो गई। कलेक्टर कोर्ट ने दस्तावेजों के आधार पर पाया कि शासकीय भूमि का पट्टा खेती करने के लिए दिया गया था, लेकिन आवंटी ने बिना कलेक्टर की अनुमति के इसे बेच दिया। इसलिए खनं 80/1/क/12 को वापस छग शासन के खाते में दर्ज कर लिया गया।
ऐसी तीन और जमीनें बाकी
बायसी कॉलोनी में संजय जैन वाले एक प्रकरण में कलेक्टर न्यायालय ने सही कार्रवाई की, लेकिन बाकी तीन खसरों को भूल गए। 80/1/क/15 रकबा 1.2140 हे., खनं 300/1/ड. रकबा 0.5850 हे. और खनं 80/68 रकबा 0.4050 हे. भी वर्तमान में संजय जैन के ही नाम पर हैं। जबकि तीनों जमीनें भी शासकीय पट्टे से प्राप्त हैं। विस्थापितों को इसका आवंटन हुआ था लेकिन बाल्को ने धोखे से रजिस्ट्री करा ली। यह जमीनें भी शासन में निहित होनी चाहिए। नियमत: जिन विस्थापितों को भूमि दी गई थी, उनके अलावा जमीन पर किसी दूसरे का नाम है तो यह गड़बड़ी है। ऐसे तमाम मामलों में शासन को जमीन वापस लेनी चाहिए क्योंकि खरीदी-बिक्री का कोई प्रमाण ही नहीं है।























