किसानों के लिए सबसे बड़ी परेशानी उनकी मेहनत की फसल को आवारा पशुओं से बचाना होती है। बार-बार फसल खराब होने से मनोबल भी गिरता है और आर्थिक नुकसान भी होता है। लेकिन अब किसान इस समस्या से छुटकारा पा सकते हैं। समाधान है – करौंदा की खेती। करौंदा एक ऐसा पौधा है, जिसे खेत की मेड़ पर लगाने से आवारा पशु पास नहीं आते। इसके कटीले पत्ते और कांटे पशुओं को दूर रखते हैं। न केवल फसल सुरक्षित रहती है, बल्कि करौंदा से अतिरिक्त आमदनी भी होती है।
रायबरेली के वरिष्ठ उद्यान निरीक्षक नरेंद्र प्रताप सिंह (बीएससी एग्रीकल्चर, इलाहाबाद विश्वविद्यालय) का कहना है कि करौंदा कम पानी में भी अच्छी तरह उग जाता है और रोपाई के 2 साल के अंदर ही यह फल देने लगता है। इसलिए इसे सह-फसली खेती के तौर पर भी अपनाया जा सकता है। अधिकांश किसान धान, गेहूं या बागवानी फसलों की खेती करते हैं, लेकिन इन फसलों की सुरक्षा के लिए उन्हें अधिक मेहनत करनी पड़ती है। करौंदा की रोपाई से यह समस्या खत्म हो जाती है। इसके पौधे कटीले होने के कारण पशु इसके पास आने से डरते हैं। इसका सीधा फायदा यह है कि खेत में लगी अन्य फसल भी सुरक्षित रहती है।
रोपाई का समय और विधि:
- करौंदा की रोपाई का सबसे उपयुक्त समय जुलाई का महीना है।
- अक्टूबर और नवंबर में भी इसे लगाया जा सकता है।
- पौधे के बीच की दूरी लगभग 2 मीटर रखनी चाहिए।
- रोपाई से पहले मिट्टी का शोधन करना जरूरी है, ताकि पौधे की वृद्धि अच्छी हो और कीटों का खतरा कम हो।
करौंदा न केवल कम पानी में जीवित रहता है, बल्कि जल्दी फल देता है। किसान इसे अपने खेत की मेड़ पर लगाकर फसल की सुरक्षा सुनिश्चित कर सकते हैं और साथ ही अतिरिक्त आमदनी भी कमा सकते हैं। इस प्रकार करौंदा किसान के लिए दोहरी सुरक्षा और दोहरी कमाई का माध्यम बन सकता है, फसल की रक्षा और आर्थिक लाभ दोनों।























