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14 हेक्टेयर में हुआ था मुनगा रोपण, न प्लांट बना न पौधे बचे

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डीएमएफ से दिए थे 14 करोड़ रुपए, प्लांट बनाने के नाम पर पहले ही 1.19 करोड़ डूबे


रायगढ़, (केलो प्रवाह)। विकास पथ पर बढ़ते छत्तीसगढ़ में भ्रष्टाचार भी अलग लेवल का है। मुनगा प्रोसेसिंग प्लांट के नाम पर 1.19 करोड़ डकारने के साथ-साथ मुनगा प्लांटेशन के नाम पर भी ठगा गया। दो गांवों में 14 हे. भूमि पर मुनगा रोपण हुआ था। इधर प्लांट भी नहीं बना और मुनगा के पौधे भी गायब हो गए। घरघोड़ा में मुनगा प्रोसेसिंग प्लांट के लिए आदिम जाति कल्याण विभाग ने परियोजना मद से दो करोड़ रुपए उद्यानिकी विभाग को दिए गए थे। विभाग ने 1.19 करोड़ रुपए खर्च करके 79 लाख रुपए लौटा दिए। जिले के पांच आदिवासी ब्लॉक धरमजयगढ़, घरघोड़ा, तमनार, लैलूंगा और खरसिया में रोजगार के साधन बढ़ाने और मुनगा के पौष्टिक आहार बनाने के लिए आदिम जाति कल्याण विभाग ने परियोजना मद से इस प्रोजेक्ट के लिए दो करोड़ रुपए की मंजूरी दी थी। विशेष केंद्रीय सहायता के तहत केंद्र सरकार की ओर से आवंटन मिला था। इस राशि से उद्यानिकी विभाग को घरघोड़ा में मुनगा प्रोसेसिंग यूनिट लगाने का काम दिया गया था, लेकिन प्लांट लगने के पहले ही भवन ढह गया। 1.19 करोड़ रुपए खर्च होने के बावजूद एक इंच काम भी नहीं हुआ। दूसरी ओर प्रोसेसिंग प्लांट को कच्चा माल उपलब्ध कराने के लिए खरसिया के तेंदूमुड़ी में 9 हे. और धरमजयगढ़ के बकालो में 5 हे. भूमि पर मुनगा का रोपण कराया गया था। दोनों जगहों पर कुल मिलाकर 14.22 लाख रुपए खर्च हुए थे। अब न तो मुनगा प्रोसेसिंग प्लांट दिखा और न ही मुनगा के पौधे हैं।


जांच नहीं हुई क्योंकि ठेकेदार करीबी था
दो करोड़ में 1.15 करोड़ की मशीनरी और 85 लाख का शेड बनाया जाना था। प्रोजेक्ट को पूरा करने की जिम्मेदारी रायपुर की कंसल्टेंसी सिटकॉन को दे दी गई थी। औद्योगिक शेड बनाने का काम जैन एसोसिएट नामक ठेका कंपनी को मिला था। बताया जा रहा है कि अफसरों ने अवैध कमाई के लिए ही कंसल्टेंसी फर्म को बीच में घुसाया। मई 2022 में निर्माणाधीन भवन ढह गया। पीडब्ल्यूडी ने जांच में पाया कि ठेकेदार ने गुणवत्ताहीन काम किया था। लेकिन तब तक ठेकेदार को 29,52,851 रुपए का भुगतान किया जा चुका था। मशीनरी खरीदने के लिए भी ऑर्डर दे दिया गया था। उद्यानिकी विभाग ने मशीन के लिए 89,63,200 रुपए का भुगतान कर दिया है। प्रोजेक्ट फेल होने के बाद उद्यानिकी विभाग ने आदिवासी विकास विभाग को चुपचाप 81 लाख रुपए वापस कर दिए।

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Editorial

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