भारत और पाकिस्तान के बीच 15 फरवरी को होने वाले महामुकाबले पर सस्पेंस अब किसी थ्रिलर फिल्म जैसा हो गया है। पाकिस्तान सरकार ने पहले तो स्कॉटलैंड को टूर्नामेंट में शामिल करने के विरोध में भारत के खिलाफ मैच के बहिष्कार का बम फोड़ा, लेकिन अब पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड (PCB) इस फैसले से पीछे हटने की राह तलाश रहा है। हालांकि, पीसीबी इस बार ‘खाली हाथ’ लौटने के मूड में नहीं है और उसने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (ICC) के सामने अपनी मांगों की एक लंबी फेहरिस्त रख दी है। इस पूरे विवाद में पीसीबी की सबसे बड़ी चाल ‘पैसे की ताकत’ को हथियार बनाना है।
बोर्ड का सीधा सा तर्क है कि जब भारत-पाकिस्तान का मैच आईसीसी की तिजोरी भरने में सबसे ज्यादा योगदान देता है, तो उनके हिस्से में आने वाले 34.5 मिलियन डॉलर को भी उसी अनुपात में बढ़ाया जाना चाहिए। एक तरह से पीसीबी इस मौके का इस्तेमाल अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत करने के लिए सौदेबाजी के तौर पर कर रहा है। सिर्फ पैसा ही नहीं, पीसीबी ने एक बार फिर उस पुराने घाव को कुरेदने की कोशिश की है जो 2013 से बंद पड़ा है। बोर्ड चाहता है कि आईसीसी मध्यस्थ की भूमिका निभाए और बीसीसीआई को भारत-पाक द्विपक्षीय सीरीज के लिए राजी करे। हालांकि, क्रिकेट की दुनिया जानती है कि बीसीसीआई का रुख पत्थर की लकीर जैसा है। जब तक भारत सरकार की हरी झंडी नहीं मिलती, मैदान पर दोनों टीमों की अकेले में मुलाकात नामुमकिन है।
इन सबके बीच, मैदान पर खेल भावना और मर्यादा का एक नया पहलू भी जुड़ गया है। 2025 के एशिया कप के दौरान पहलगाम हमले के विरोध में भारतीय टीम ने हाथ न मिलाने की जो नीति अपनाई थी, पीसीबी उसे खत्म करना चाहता है। पाकिस्तान की मांग है कि भारतीय खिलाड़ी मैच के दौरान पारंपरिक रूप से हाथ मिलाने की प्रक्रिया को फिर से शुरू करें। अब गेंद पूरी तरह से आईसीसी और बीसीसीआई के पाले में है कि वे पाकिस्तान की इन शर्तों को कितना गंभीरता से लेते हैं।























