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पूर्व जमीन मालिकों ने मुआवजा पाने के बाद बेची जमीन, प्रतिबंध के बावजूद डायवर्सन

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  • नेशनल हाईवे किनारे भूमि का आवासीय या कमर्शियल उपयोग करने पर लगी है रोक

रायगढ़। सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में नेशनल हाईवे किनारे हुए अतिक्रमणों और निर्माणों पर सख्त टिप्पणी की है, लेकिन इससे रायगढ़ में कोई फर्क नहीं पड़ता। यहां तो एनएच किनारे की जमीन का भूअर्जन होने के बाद उसकी बिक्री भी हुई और डायवर्सन भी। अब इसे किसी भी तरह से सही प्रमाणित करने का प्रयास किया जा रहा है। नेशनल हाईवे 49 में भूमि अधिग्रहण एक भूलभुलैया की तरह है। जब सीमांकन के बाद एलाइनमेंट तय किया गया, तब कुछ कारोबारियों ने चाल चली। ऐसा षडयंत्र रचा गया जिससे उनकी जमीन का अधिग्रहण भी हो गया और जमीन बच भी गए। एलाइनमेंट इस तरह से सेट किया गया कि उनकी जमीन एनएच किनारे ही हो।

जोरापाली में तो तबाही मचा दी गई है। यहां मामला खसरा नंबर 357 का है। धारा 3ए का प्रकाशन हुआ तो एलाइनमेंट के हिसाब से मूल खसरे 357 के पांच टुकड़े प्रभावित हो रहे थे। मतलब खसरा नंबर 1 से पांच तक एनएच में जा रहे थे। वर्ष 12-13 में 357 के पांच ही टुकड़े थे जिनका कुल रकबा 2.741 हे. था। इसमें से 357/4 से रकबा 0.405 हे. कृषि भूमि ली जानी थी जिसके भूमिस्वामी वीरेंद्र शर्मा पिता रामसेवक शर्मा थे। अवार्ड में इस खसरे से 0.323 हे. का मुआवजा 53.07 लाख रुपए वीरेंद्र शर्मा को मिला। वहीं खनं 357/5 में से 0.275 हे. रकबा प्रभावित होना था।

इसके भूमिस्वामी धर्मेंद्र पटेल, कपिलेश्वर पटेल, अजय अग्रवाल, जगन्नाथ अग्रवाल आदि ने 0.004 हे. के लिए 69,670 रुपए प्राप्त किए। यह बात समझ से परे है कि 357/5 एनएच से दूर होने के बावजूद जमीन कैसे प्रभावित हुई। इसके बाद दोनों जमीनें बिना नक्शा बटांकन के किसी और को विक्रय कर दी गई। सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट आदेश है कि कोई भी विभाग या स्थानीय निकाय एनएच के किनारे निर्माण को क्लीयरेंस या लाइसेंस का नवीनीकरण नहीं करेगा। राज्यों को अधिसूचना भी जारी करनी है जिसमें एनएच के बीच से 40 मीटर के दायरे में भूमि को आवासीय उपयोग और 75 मीटर तक कमर्शियल यूज पर प्रतिबंध होगा। सवाल यह उठता है कि दोनों जमीनों का डायवर्सन कैसे हो गया।

रिकॉर्ड अपडेट करने के दस्तावेज में अलग रकबा
प्रारंभिक प्रकाशन, अवार्ड पत्रक और रिकॉर्ड दुरुस्ती के प्रकाशन में अलग-अलग रकबे हैं। यदि माना जाए कि अंतिम प्रकाशन में खनं 357/4 रकबा 0.405 हे. से 0.323 हे. और 357/5 रकबा 0.275 हे. में से 0.004 हे. ही भू-अर्जन में प्रभावित हुआ जो 2016-17 के राजस्व आदेश परिपत्र में भी दर्ज है। तो इस हिसाब से दोनोंं में क्रमश: 0.082 हे. और 0.271 हे. जमीन बचती। लेकिन आदेश के मुताबिक खनं 357/4 में रकबा 0.0820 हे. और 357/5 रकबा 0.2710 हे. को अधिग्रहित दिखाया गया है। वर्तमान में दोनों खसरों में क्रमश: 0.0820 हे. और 0.2710 हे. व्यपवर्तित भूमि दर्ज है।

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Editorial

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