रायपुर। किसान तुलसीराम मौर्य की कहानी एक साधारण किसान से प्रेरक व्यक्तित्व बनने तक की यात्रा है। दंतेवाड़ा जिले के गीदम ब्लॉक के ग्राम छिंदनार (बड़े पारा) में रहने वाले तुलसीराम कभी पारंपरिक खेती में बढ़ते खर्च, घटती उपज और कमजोर होती मिट्टी से परेशान रहते थे। रासायनिक खाद और कीटनाशकों के लगातार इस्तेमाल ने उनके खेतों की ताकत भी कम कर दी थी। इसी बीच नेशनल मिशन ऑन नेचुरल फार्मिंग से जुड़े प्रशिक्षण ने उनकी सोच और खेती दोनों की दिशा बदल दी। प्रशिक्षण के बाद उन्होंने श्री विधि के साथ कुटकी, कोसरा और रागी की खेती शुरू की। इसके साथ ही गोबर खाद, जीवामृत और नीम-लहसुन से बने प्राकृतिक घोल का उपयोग करना शुरू किया।
परिणाम धीरे-धीरे साफ दिखने लगे। खेत की मिट्टी पहले से कहीं ज्यादा उपजाऊ हो गई, उत्पादन बढ़ा और खेती की लागत में बड़ी कमी आई। सब्जियों की खेती ने तुलसीराम को रोजाना आय का नया स्रोत भी दिया। भिंडी, करेला, लौकी, टमाटर और मिर्च जैसी उनकी जैविक सब्जियों की बाजार में अच्छी मांग है, क्योंकि लोग इन्हें रसायनमुक्त होने के कारण ज्यादा कीमत पर खरीदते हैं। तुलसीराम की सफलता से गांव के अन्य किसान भी प्रभावित हुए। आज गांव के 20 से अधिक किसान प्राकृतिक खेती और श्री विधि अपना रहे हैं। गांव की महिलाएं भी जैविक घोल तैयार करने में सक्रिय हैं, जिससे उन्हें भी आजीविका का नया रास्ता मिला है।
उनके उत्कृष्ट काम को देखते हुए कृषि विभाग ने तुलसीराम मौर्य को आदर्श कृषक सम्मान से भी सम्मानित किया है। तुलसीराम अब भविष्य में अपने 5 एकड़ खेत को पूरी तरह जैविक खेती क्षेत्र के रूप में विकसित करने की योजना बना रहे हैं। इसके साथ ही वे जैविक अनाज की प्रोसेसिंग यूनिट और ऑनलाइन मार्केटिंग प्लेटफॉर्म शुरू करने की तैयारी में हैं, ताकि उनकी उपज सीधे उपभोक्ताओं तक पहुंच सके। छिंदनार के मेहनतकश किसान तुलसीराम मौर्य की यह कहानी बताती है कि अगर सही मार्गदर्शन और नई तकनीक मिल जाए, तो खेती न सिर्फ लाभदायक बन सकती है बल्कि किसान के जीवन में आत्मविश्वास और सम्मान भी भर सकती है।

























