अगर खेती को सिर्फ गुज़र-बसर का साधन मानने के बजाय एक लाभकारी व्यवसाय बनाना हो, तो यह सरगुजा जिले के परसा पाली गांव के युवा किसान रामप्रसाद सिंह से सीखा जा सकता है। पिछले दस सालों से वह अपने दादा-परदादा की सिखाई अरहर की खेती को न सिर्फ आगे बढ़ा रहे हैं, बल्कि हर सीज़न में 1 से 2 लाख रुपये तक का शुद्ध मुनाफा कमाकर अपने इलाके में एक नई मिसाल कायम कर रहे हैं।
बाज़ार की समझ और भंडारण का फायदा
रामप्रसाद सिंह की सफलता का सबसे बड़ा सूत्र उनकी बाज़ार की गहरी समझ और सही भंडारण रणनीति है। वह अपनी 6 से 7 एकड़ ज़मीन पर अरहर की खेती करते हैं, जिससे हर सीज़न में उन्हें लगभग 7 से 8 क्विंटल दाल का उत्पादन मिलता है। उनका सीधा सिद्धांत है: कटाई के तुरंत बाद माल नहीं बेचना। रामप्रसाद बताते हैं, “अगर बाज़ार में उचित दाम नहीं मिलता है तो हम दाल को घर में ही संग्रहित कर लेते हैं। जब अच्छा रेट मिलता है, तभी बेचकर मुनाफा कमाते हैं।” उनकी यह सूझबूझ उन्हें फसल का सबसे अच्छा मूल्य दिलाती है, जिससे अरहर की खेती उनके लिए मुनाफे का एक बड़ा ज़रिया बन गई है।
सरल प्रक्रिया, कम लागत
रामप्रसाद सिंह इस खेती को बेहद लाभकारी मानते हैं क्योंकि इसकी प्रक्रिया सरल है और मेहनत कम लगती है।
- खेती की शुरुआत में खेत में गोबर खाद डाली जाती है।
- इसके बाद जुताई और बरसात की शुरुआत में बुवाई होती है।
- यह फसल मुख्य रूप से बारिश के पानी से ही आसानी से तैयार हो जाती है, जिससे सिंचाई का खर्च और मेहनत कम हो जाती है।
यही वजह है कि वह इस खेती को पूरी लगन के साथ करते हैं और अच्छा उत्पादन प्राप्त कर खुशहाल जीवन जी रहे हैं।
परंपरा और व्यवसाय का मेल
रामप्रसाद सिंह के लिए अरहर की खेती केवल व्यवसाय नहीं है, बल्कि यह उनके परिवार की पुरानी परंपरा है। उन्होंने अपने दादा-परदादा से खेती-किसानी सीखी और उसी परंपरा को सफलतापूर्वक आगे बढ़ाया है। वह इसे व्यवसाय और अपनी संस्कृति को संजोने, दोनों के तौर पर देखते हैं, जिससे उन्हें इस काम में और भी अधिक आनंद आता है।रामप्रसाद सिंह की यह कहानी साबित करती है कि पारंपरिक खेती को सही समय पर बिक्री और उचित प्रबंधन के साथ जोड़कर एक लाभदायक उद्यम में बदला जा सकता है।























