रायपुर। पारंपरिक खेती से उबकर अब छत्तीसगढ़ सहित देशभर के किसान वैकल्पिक खेती की ओर रुख कर रहे हैं। इसी कड़ी में जरबेरा फूल की खेती किसानों के लिए एक नया और लाभकारी विकल्प बनकर उभरी है। यह एक ऐसी फसल है जिसे एक बार लगाने के बाद किसान लगातार छह वर्षों तक कमाई कर सकते हैं। जानकारों के अनुसार, जरबेरा की कट फ्लावर के रूप में मांग दिनों-दिन बढ़ रही है। शादी-ब्याह, समारोह, होटल और सजावट के कार्यों में इसकी खूब खपत हो रही है। यही कारण है कि बाजार में इसकी कीमत ₹3 से ₹10 प्रति फूल तक पहुँच चुकी है।
आधा एकड़ से सालाना 12-15 लाख रुपये की कमाई
जरबेरा की खेती आधुनिक ग्रीनहाउस पद्धति से की जा रही है। इसमें ड्रिप इरिगेशन तकनीक के जरिए पौधों को बूंद-बूंद पानी दिया जाता है, जिससे जल संरक्षण के साथ-साथ उत्पादन की गुणवत्ता भी बनी रहती है। खेती में करीब 70 से 75 लाख रुपये की शुरुआती लागत आती है, जिसमें 25 हजार पौधों का रोपण किया जाता है। किसान बताते हैं कि एक बार रोपण करने के बाद छह वर्षों तक प्रतिदिन करीब 25% पौधों से फूल निकलते हैं। इस फसल से आधा एकड़ क्षेत्र में सालाना ₹12 से ₹15 लाख रुपये तक की आमदनी हो रही है।
कम मेहनत, ज्यादा मुनाफा
किसानों के अनुसार, जरबेरा की खेती में पारंपरिक फसलों के मुकाबले ज्यादा मेहनत नहीं लगती। मुख्य खर्च शुरुआती ग्रीनहाउस निर्माण और पौधों की खरीदी में होता है। उसके बाद केवल सिंचाई और नियमित देखरेख की जरूरत पड़ती है। फसल से प्रति वर्ष 8 से 10 लाख रुपये तक का शुद्ध मुनाफा आसानी से हो सकता है।
सरकार भी दे रही सहयोग
राज्य सरकार की विभिन्न योजनाओं के तहत फूलों की खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है। जरबेरा जैसे विदेशी फूलों की खेती के लिए सब्सिडी और तकनीकी मार्गदर्शन भी उपलब्ध कराया जा रहा है। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि यदि किसान इस ओर ध्यान दें तो खेती-किसानी की तस्वीर ही बदल सकती है।

नवाचार की ओर बढ़ते कदम
एक समय था जब किसान केवल धान, गेहूं और सब्जियों तक ही सीमित थे, लेकिन अब परिदृश्य बदल चुका है। छत्तीसगढ़ के कई जिलों में जरबेरा, गुलाब और लिली जैसे फूलों की व्यावसायिक खेती तेजी से बढ़ रही है। बाजार की बढ़ती मांग और बेहतर मूल्य मिलने से यह खेती किसानों के लिए आय का स्थायी स्रोत बन रही है।
























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