Skip to content
Home | 30 साल बाद जब गांव पहुंचा जवान तो थम गईं गांव धड़कनें, बैंड बाजे के साथ ऐतिहासिक स्वागत

30 साल बाद जब गांव पहुंचा जवान तो थम गईं गांव धड़कनें, बैंड बाजे के साथ ऐतिहासिक स्वागत

भारतीय सेना के गौरवशाली इतिहास और 30 वर्षों की अटूट कर्तव्यनिष्ठा को अपने सीने पर पदक के रूप में सजाए जब कैप्टन मनोज सिंह अपने गृह जनपद गया पहुंचे, तो मानपुर की सड़कों पर जनसैलाब उमड़ पड़ा। 1995 में भारतीय सेना का हिस्सा बने कैप्टन मनोज सिंह के सेवानिवृत्त होकर घर लौटने की खबर ने अमरा गांव को किसी उत्सव के केंद्र में बदल दिया था। मानपुर बाजार से लेकर गांव की चौखट तक, हर तरफ बस देशभक्ति के तराने और ‘भारत माता की जय’ के उद्घोष सुनाई दे रहे थे। यह नजारा केवल एक सैनिक की घर वापसी का नहीं था, बल्कि एक राष्ट्रभक्त के प्रति पूरे समाज के कृतज्ञता प्रकट करने का क्षण था।

अपने जांबाज बेटे की अगवानी के लिए पिता सिद्धेश्वर सिंह और माता शांति देवी की आंखें मानपुर बाजार में ही बिछी हुई थीं। जैसे ही कैप्टन मनोज अपनी गाड़ी से उतरे, परिजनों और ग्रामीणों ने उन्हें मालाओं से लाद दिया। बैंड-बाजे की मधुर धुनों के बीच सैकड़ों लोग तिरंगा हाथों में लिए उनके साथ पैदल ही गांव की ओर निकल पड़े। रास्ते भर ग्रामीणों ने उन पर फूलों की बारिश की, जिससे पूरा मार्ग केसरिया और सफेद पंखुड़ियों से पट गया। ऑपरेशन कारगिल जैसे दुर्गम और ऐतिहासिक सैन्य अभियानों में अपनी वीरता का परिचय देने वाले कैप्टन मनोज के चेहरे पर इस आत्मीय स्वागत को देख गहरी संतुष्टि और भावुकता के भाव साफ झलक रहे थे।

पत्रकारों और स्थानीय लोगों से बात करते हुए कैप्टन मनोज सिंह ने कहा कि एक सैनिक के लिए देश की सेवा करना उसके जीवन का सबसे बड़ा पुरस्कार होता है। उन्होंने सेना में बिताए अपने 30 वर्षों के सफर को एक दुर्लभ और गौरवपूर्ण अनुभव बताया। नई पीढ़ी को प्रेरित करते हुए उन्होंने जोर दिया कि आज के युवाओं को अपने जीवन में अनुशासन और ईमानदारी को सर्वोच्च स्थान देना चाहिए। उन्होंने कहा कि राष्ट्रवाद केवल एक भावना नहीं, बल्कि एक मार्ग है जिस पर चलकर देश को उन्नति के शिखर पर ले जाया जा सकता है। शाम ढलते-ढलते जब कैप्टन अपने घर पहुंचे, तो पूरे अमरा गांव में दीपावली जैसा माहौल था, जहाँ हर ग्रामीण अपने इस नायक की बहादुरी की कहानियों पर गर्व कर रहा था।