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खेतों में ‘पुतलों की फौज’ का पहरा : किसानों का अनोखा देशी जुगाड़ बना मिसाल, अब चोर और जानवर भी खाने लगे हैं धोखा

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रायपुर। मवेशी पक्षी और चोरों से अपनी फसलों को सुरक्षित रखने के लिए नवागढ़ ब्लॉक के ग्राम सेमरिया के किसानों ने एक बेहद अनूठा और प्रभावी तरीका अपनाया है। यहाँ के प्रगतिशील किसान संतोष वर्मा ने तकनीक या महंगे सुरक्षा गार्डो की बजाय पुतलों की फौज को अपने खेतों पर तैनात कर दिया है। पिछले चार वर्षो से जारी इस सफल प्रयोग ने अब एक बड़े अभियान का रूप ले लिया है। सेमरिया के अधिकांश खेतों में इस तरह की स्थिति है। सेमरिया के अलावा आसपास के कई गांव के ग्रामीण इस तरह के प्रयोग करने लगे हैं।

खेतों में अधिक संख्या में पुतले लगाने की पहल शुरू की
संतोष वर्मा के इस नवाचार को देखकर अब आसपास के अन्य किसानों ने भी अपने खेतों की सुरक्षा के लिए अधिक संख्या में पुतले लगाने की पहल शुरू कर दी है। यह देशी जुगाड़ न केवल फसलों को बचा रहा है बल्कि क्षेत्र के लोगों के लिए चर्चा का केंद्र बना हुआ है। नवागढ़ मुंगेली मार्ग के किनारे स्थित संतोष वर्मा के 80 डिसमिल के खेत पर जब आप नजर डालेंगे तो आपको सूट-बूट जींस और टी-शर्ट पहने हुए दर्जनों आकृतियां नजर आएंगे।

हीरो-हीरोइन जैसे रूप दिए
संतोष ने बताया कि लगभग 8 साल पहले उन्होंने एक-दो पुतलों से शुरुआत की थी लेकिन आज उनके खेत में 50 से अधिक पुतले खड़े हैं। इन पुतलों को पति-पत्नी, बच्चे, देव-दानव, खिलाड़ी और फिल्मी हीरो हीरोइन जैसे विविध स्वरूप दिए गए हैं। इन्हें देखकर पहली नजर में कोई भी धोखा खा सकता है कि खेत में सचमुच इंसानों की भीड़ मौजूद है। संतोष के इस रचनात्मक प्रयोग का असर है कि उनका खेत अब एक सेल्फी जोन बन चूका है,जहां से गुजरने वाले राहगीर रुककर तस्वीरें जरूर लेते है।

पुतले देखकर पशु-पक्षी आसपास भटकते नहीं
इस सुरक्षा अभियान में संतोष अकेले नहीं हैं। उनके पहली किसान लखेश्वर वर्मा रतन वर्मा और परदेशी मानिकपुरी ने भी अपनी क्रिएटिविटी दिखाते हुए खेतों में पुतले लगाए है। महिलाओं का कहना है कि इंसानी कपड़े पहने इन पुतलों को देखकर पशु-पक्षी खेत के पास भटकते तक नहीं है। रात के अंधेरे में ये पुलले इतने वास्तविक लगते है कि चोर भी खेत में चूसने से पहले दस बार सोचते है। बांस की खप्पची पुराने कपड़े पैरा (पुआल) और थोड़े से जुगाड़ से तैयार ये पुतले किसानों के लिए प्री सिक्योरिटी गॉर्ड की तरह काम कर रहे है। खेत की मेढ़ों के साथ-साथ पेड़ो पर भी पुराने कपड़े और मोटर पार्ट्स बांधे गए है, ताकि हर तरफ से सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।

बिजुका या काक भगोड़ा कहा जाता है
कृषि मामलों के जानकार डॉ डोसन साहू ने बताया कि ग्रामीण अंचलों में इसे बिजूका या काक भगोड़ा कहा जाता है लेकिन सेमरिया के किसानों ने इसे एक नई ऊंबाई दी है। यहां महज एक पुतला नहीं, बल्कि पूरी फैज तैनात की गई है, जो किसानो के नवाचार और सूझबूझ का उदाहरण पेश करती है। किसानों ने अपनी फसलों की सुरक्षा के लिए स्वयं के संसाधन जुटाकर एक ऐसा मॉडल तैयार किया है, जिसमें लागत शून्य है और परिणाम शत-प्रतिशत।

खेतों में तैनात पुतलों की फौज, किसानों का अनोखा फसल रक्षक
हरे-भरे खेतों के बीच दूर से नजर आते इंसान जैसे खड़े पुतले—ये कोई साधारण दृश्य नहीं, बल्कि किसानों की मेहनत की फसल की रक्षा करने वाली “पुतलों की फौज” है। पक्षियों और जंगली जानवरों से फसल को बचाने के लिए गांवों में आज भी यह देसी और असरदार तरीका अपनाया जा रहा है।

कैसे करते हैं काम?
किसान लकड़ी या बांस के सहारे पुराने कपड़े, टोपी और कभी-कभी चमकीले प्लास्टिक या टीन के टुकड़े लगाकर पुतले तैयार करते हैं। हवा में हिलते-डुलते ये पुतले दूर से किसी इंसान की मौजूदगी का आभास कराते हैं, जिससे पक्षी खेतों से दूर रहते हैं।

कम लागत, ज्यादा फायदा
महंगे उपकरणों की तुलना में पुतले बनाना बेहद सस्ता है। गांवों में उपलब्ध संसाधनों से ही इन्हें तैयार कर लिया जाता है। खासकर धान, मक्का और सब्जियों की फसल में यह तरीका काफी कारगर साबित होता है।

आधुनिकता के साथ नया रूप
अब कई किसान पुतलों के साथ-साथ चमकदार टेप, खाली बोतलें या आवाज करने वाले डिब्बे भी लगाते हैं, ताकि प्रभाव और बढ़ सके। कुछ जगहों पर सोलर से चलने वाले साउंड डिवाइस भी लगाए जा रहे हैं, लेकिन पारंपरिक पुतले आज भी भरोसेमंद साथी बने हुए हैं।

परंपरा और जुगाड़ का मेल
पुतले सिर्फ फसल रक्षक ही नहीं, बल्कि ग्रामीण जीवन की रचनात्मकता का प्रतीक भी हैं। खेतों में तैनात ये पुतले किसानों की उस समझ और अनुभव को दर्शाते हैं, जो पीढ़ियों से चली आ रही है। कुल मिलाकर, “पुतलों की फौज” किसानों का सच्चा और सस्ता पहरेदार है, जो दिन-रात खेतों में डटा रहकर मेहनत की फसल की हिफाजत करता है।

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