रायगढ़, केलो प्रवाह डेस्क। दुनिया के कई हिस्सों में चल रहे भू-राजनीतिक तनावों और कच्चे तेल की कीमतों में आए उबाल का सीधा असर अब आम आदमी की जेब पर पड़ने लगा है। पेट्रोल-डीजल के आसमान छूते दामों के बीच छत्तीसगढ़ के लोग अब एक स्मार्ट और किफायती विकल्प की तरफ तेजी से मुड़ रहे हैं। राज्य में इलेक्ट्रिक दोपहिया (बैटरी से चलने वाले) वाहनों की मांग में हाल के दिनों में बीस से तीस फीसदी तक का जबरदस्त उछाल देखा गया है। रोजमर्रा के काम से सफर करने वाले नौकरीपेशा और व्यापारी वर्ग के लिए अब पेट्रोल भरवाने से ज्यादा आसान अपनी गाड़ी को घर पर ही प्लग-इन करना लग रहा है।
महंगे ईंधन से बिगड़ा मध्यम वर्ग का बजट
राजधानी रायपुर सहित प्रदेश के कई प्रमुख जिलों में पेट्रोल का भाव एक सौ पांच रुपये प्रति लीटर के आंकड़े को पार कर चुका है। जो लोग हर दिन अपने काम के सिलसिले में तीस से पचास किलोमीटर की यात्रा करते हैं, उनके मासिक बजट का एक बड़ा हिस्सा केवल ईंधन में ही खर्च हो रहा है। ऐसे में मध्यम और निम्न-मध्यम वर्ग के लिए पारंपरिक गाड़ियों का रोज का उपयोग अब आर्थिक रूप से भारी पड़ने लगा है। यही कारण है कि शहर की सड़कों पर अब धुंआ और आवाज किए बिना चलने वाले ई-स्कूटरों की तादाद अचानक बढ़ गई है।
नई तकनीक और शानदार माइलेज ने जीता भरोसा
ऑटो सेक्टर के जानकारों का मानना है कि कुछ साल पहले तक ग्राहकों के मन में बैटरी की लाइफ और सफर की दूरी को लेकर कई तरह के संशय हुआ करते थे। लेकिन अब ऑटोमोबाइल बाजार में ऐसी अत्याधुनिक गाड़ियां आ चुकी हैं जो एक बार फुल चार्ज होने पर डेढ़ सौ से लेकर पांच सौ किलोमीटर तक का शानदार सफर तय कर सकती हैं। ऑटोमोबाइल डीलर्स भी बताते हैं कि इंजन ऑयल, गियर या क्लच जैसे झंझट न होने के कारण इन गाड़ियों के रखरखाव (मेंटेनेंस) का खर्च ना के बराबर आता है। इसके साथ ही बिना शोर-शराबे की आरामदायक और स्मूद राइडिंग भी शहरी ग्राहकों को खूब लुभा रही है। स्विगी, जोमैटो जैसी डिलीवरी सेवाओं और कैब कंपनियों ने भी बड़े पैमाने पर इन गाड़ियों को अपनाना शुरू कर दिया है।
सब्सिडी का लाभ और चार्जिंग स्टेशनों का बढ़ता जाल
आंकड़ों पर गौर करें तो छत्तीसगढ़ में अब तक लगभग एक लाख अस्सी हजार से अधिक बैटरी चालित गाड़ियों का पंजीयन हो चुका है। सरकार भी इस ई-मोबिलिटी को बढ़ावा देने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ रही है। राज्य की ईवी पॉलिसी के अनुसार नई इलेक्ट्रिक गाड़ी खरीदने पर उसकी कुल कीमत का दस प्रतिशत या अधिकतम एक लाख रुपये तक की आर्थिक सहायता (सब्सिडी) दी जा रही है। साथ ही लाइफटाइम रोड टैक्स में भी पचास फीसदी की छूट का प्रावधान है। प्रदेश भर में अभी करीब पौने तीन सौ पब्लिक चार्जिंग पॉइंट काम कर रहे हैं, जिनमें रायपुर, दुर्ग और बिलासपुर सबसे आगे हैं। अकेले राजधानी में पब्लिक चार्जिंग का खर्च लगभग अठारह रुपये प्रति यूनिट आ रहा है और शासन की योजना जल्द ही एक हजार नए चार्जिंग स्टेशन स्थापित करने की है। अब तक हजारों वाहन मालिकों को करोड़ों रुपये की सब्सिडी बांटी जा चुकी है।
इलेक्ट्रिक गाड़ियों के सामने खड़ी प्रमुख चुनौतियां
जहां एक तरफ इन आधुनिक गाड़ियों के ढेरों फायदे हैं, वहीं कुछ व्यावहारिक दिक्कतें भी हैं जिन्हें फिलहाल नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सबसे बड़ी अड़चन चार्जिंग में लगने वाला समय और इसका बुनियादी ढांचा है। पेट्रोल पंप पर जहां कुछ ही मिनटों में टंकी फुल हो जाती है, वहीं इन गाड़ियों को चार्ज करने में घंटों का वक्त लग जाता है। फास्ट चार्जिंग के बाद भी इसमें पेट्रोल भराने के मुकाबले काफी ज्यादा समय लगता है। इसके अलावा, छोटे कस्बों और ग्रामीण इलाकों में चार्जिंग सुविधाओं का अब भी घोर अभाव है, जिससे लंबे सफर पर निकलने से पहले बैटरी खत्म होने की चिंता सताती है।
गाड़ियों की बैटरी की मियाद पूरी होने या उसके खराब होने पर उसे बदलवाने का खर्च भी हजारों में आता है। इसके साथ ही, बहुत ज्यादा गर्मी या कड़ाके की ठंड जैसे मौसम में भी बैटरी की कार्यक्षमता (रेंज) पर सीधा असर पड़ता है।
जानकारों का निष्कर्ष यही है कि भारत जैसे विशाल देश में अभी कुछ और सालों तक पेट्रोल और बैटरी वाले वाहनों का मिला-जुला दौर ही चलेगा। शहरों के भीतर रोजमर्रा के कामों के लिए इलेक्ट्रिक गाड़ियां एक बेहतरीन और पैसे बचाने वाला सौदा साबित हो रही हैं। हालांकि जब बात लंबी दूरी की यात्रा या ग्रामीण क्षेत्रों की हो, तो पारंपरिक ईंधन वाले वाहन ही ज्यादा सुविधाजनक लगते हैं। लेकिन जिस रफ्तार से चार्जिंग का नेटवर्क और बैटरी की तकनीक एडवांस हो रही है, आने वाले कुछ ही सालों में सड़कों की तस्वीर पूरी तरह बदल सकती है।























